Thursday, May 1, 2025

ब्रज 84 कोस यात्रा, भाग - 2

पिछले ब्लॉगपोस्ट "ब्रज 84 कोस यात्रा, भाग - 1" से आगे :--
रमण रेती में रमण बिहारी जी का मंदिर
 
     इस यात्रा का अगला दिन अर्थात दूसरा दिन रविवार था। हमलोग तय समय सुबह 8 बजे तैयार होकर होटल से नीचे आये जहाँ हमारे पथ-प्रदर्शक सोनू कौशिक जी महाराज कार के साथ प्रतीक्षा कर रहे थे।हमलोग कार में बैठ कर चले और "गोविन्द मेरो हैं, गोपाल मेरो हैं" के भजन गाते, बृन्दावन बिहारी लाल की जयकारा करते आज की यात्रा की शुरुआत की। आज की यात्रा महाराज जी ने गोकुल के तरफ की रखी। सबसे पहला पड़ाव था "रमण-रेती" | 

       1. रमण रेती - यह वह स्थान है जहाँ श्रीकृष्ण बाल्यावस्था में सखाओं संग खेला करते थे। रेती के गेंद बना कर एक दूसरे को मारते थे। यहाँ की रेत को पवित्र माना जाता है और भक्तजन श्रद्धा पूर्वक इसे अपने सर से लगते हैं। लोग यहाँ की रेत में लेटते हैं, नाचते हैं तथा रेती की गेंद बना बना कर एक दूसरे पर फेकते हैं बिल्कुल कान्हा की क्रीड़ाओं के भाव में। यहाँ का वातावरण बहुत ही उल्लासपूर्ण होता है। हमलोग जब यहाँ थे तो अन्य लोगों के अलावा एक दादी-पोते की जोड़ी ने हमारा ध्यान खींचा जो रेती की गेंद बना कर एक दूसरे पर दौड़ा दौड़ा कर फेंक रहे थे।
रमण रेती पर सभी बाल-भाव से क्रीड़ा करते हैं।
           लेकिन रेती पर जाने से पहले हमलोग रमन-बिहारी जी के बड़े से मंदिर में गए, वहां दर्शन किया और अन्य भक्तों के साथ भजन-मंडली की संगीत पर नाचे। यह ऐसा स्थान है जहाँ से आने का मन ही नहीं करता। हमारा आज का पहला पड़ाव ही इतना उल्लासपूर्ण था कि दिन बन गया। 
रमण रेती में रमण बिहारी जी, राधा जी के साथ विराजे हैं।


            वैसे तो यह स्थान श्रीकृष्ण की बाल क्रीड़ाओं के कारण इतना महत्वपूर्ण है किन्तु आधुनिक समय में इस स्थान पर संत कवि रसखान जी की तपस्थली भी रही है। रसखान जी कृष्ण और ब्रज प्रेम में इतने रमे थे कि उन्होंने अपने मज़हब की भी परवाह न की। कृष्ण-भक्तों में उनका नाम अग्रणी है। 
             
       2. चौरासी खम्भा - ब्रज के 12 वनों में से एक महावन में स्थित यह भवन नन्द बाबा का भवन है जहाँ कृष्ण-बलराम जी का बचपन बीता था। यहाँ के पुजरियों के अनुसार यह भवन 5,500 वर्ष पुराना है जिसके शुरू के चार खम्भे ब्रह्मा जी ने बनाये थे और बाकी के 80 विश्वकर्मा जी ने। ब्रह्माजी के चार खम्भे, चार युग का प्रतिनिधित्व करते हैं और उन युगों से सम्बन्धित चिह्न इन पर अंकित हैं। 
चौरासी खम्बा मंदिर, महावन,मथुरा।


        यहाँ कृष्ण-बलराम, नन्द बाबा और यशोदा मैया की  मूर्तियां हैं। एक स्थान पर बाल कृष्ण की छठी मनाते चित्र हैं। कहते हैं कि चौरासी खम्भा मंदिर में आने से 84 योनियों में भटकना नहीं पड़ता। मंदिर के प्रांगण में मुख्य द्वार के पास ही एक अत्यंत पुराना वृक्ष है जिसके नीचे काली जी की प्रतिमा है। इस विक्ष को लोहे जाली से सुरक्षित किया गया है।  पुजारी जी ने बताया कि यह पञ्च-पीपल वृक्ष है जिसमें पाँच तरह के फूल लगते हैं, जो कार्तिक के मास में ज्यादा निकलते हैं। मनोकामनाओं को पूर्ण करता है यह। 
पञ्च -पीपल, जिसपर पांच रंग के फूल आते हैं।
(चौरासी खम्बा मंदिर, महावन, मथुरा)


     एक पीपल का वृक्ष भी है जिसमे मनौती के लिए लोग धागे बांधते हैं। मंदिर के एक किनारे पर बाल-कृष्ण द्वारा ऊखल -बन्धन के कारण जुड़वाँ वृक्षों को गिराने की भी मूर्ति बनायी गयी है किन्तु यहाँ फोटो लेना मना है। 
वट -वृक्ष में बाँधे गए मनौतियों के धागे
(चौरासी खम्बा मंदिर, महावन, मथुरा)
          मंदिर के द्वार के पास एक लस्सी-राबड़ी की दुकान है जो काफी प्रचलित है। 

     3. ब्रह्माण्ड घाट - शांत यमुना जी के किनारे गोकुल में यह वही जगह है जहाँ मिट्टी खाने पर यशोदा मैया ने बाल कृष्ण का मुँह खुलवाया था ताकि मिट्टी निकलवा सके किन्तु उन्हें तो कृष्ण के मुँह में पूरा ब्रह्माण्ड ही दिखाई दिया। लोग यहाँ यमुना जी में स्नान भी करते हैं अथवा शरीर पर कुछ बूंदें छिड़क कर आँखों की पलकों पर लगते हैं। पास ही ब्रह्माण्ड बिहारीजी का मंदिर है जिसमेंभक्त दर्शन करते हैं। 
ब्रह्माण्ड विहारी जी मंदिर,गोलोक धाम, ब्रह्माण्ड घाट (मथुरा)

  
         मंदिर के द्वार पर यहाँ की मिट्टी की गोलियों के पैकेट्स बेची जाती हैं जिन्हें भक्तजन श्रद्धापूर्वक खरीद कर घर ले जाते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि इन गोलियों में चमत्कारी उपचार होते हैं।
ब्रह्माण्ड घाट पर वट-वृक्ष पर बाँधे गए मनौतियों के कपडे।


      इस घाट के किनारे बरगद के दो बड़े वृक्ष हैं जिनपर भक्तजन मनौतियाँ मांगते हुए पटके या धागे बाँधते हैं। यमुना जी का किनारा, वट -वृक्ष, शुद्ध -पवित्र हवा और भक्तों का आना-जाना ;कुल मिला कर यहाँ एक आनंददायक वातावरण होता है। 

       4. चिंताहरण महादेव - हमारा अगला भ्रमण-स्थल था चिंताहरण महादेव। जब यशोदा मैया ने बाल-कृष्ण के मुख से मिट्टी उगलवाने के लिए मुँह खुलवाया तो उनके मुँह में पूरा ब्रह्माण्ड देखकर वे चिंतित हो उठीं और महादेव को स्मरण कर पुकारने लगीं। पुकार सुनकर महादेव प्रकट हुए। मैया ने उनका यमुना जल से अभिषेक किया। प्रसन्न हो कर महादेव ने उन्हें बताया कि बालक तो स्वयं विश्व का रचयिता है, चिंता की कोई बात नहीं। तब यशोदा मैया की चिंताएं दूर हो गयीं। 
चिंताहरण महादेव मंदिर, मथुरा।


        महादेव ने मैया को यह वरदान देते हुए कि जो भी यहाँ महादेव पर एक लोटा जल चढ़ाएगा उसकी चिंताएं दूर होंगीं, अंतर्धान हो गए। तब से इनका नाम चिंताहरण महादेव पड़ा। यहाँ ब्रजवासी और श्रद्धालु शिवलिंग पर एक लोटा जल अवश्य चढ़ाते हैं।  
चिंताहरण महादेव जिनपर एक लोटा जल
चढाने से चिंताएँ दूर होती हैं।
 
      5. दाऊ जी का मंदिर - मथुरा शहर से लगभग 18 किलोमीटर की दूरी पर बलदेव नामक स्थान पर बलराम जी (जिन्हें कृष्ण के बड़े भाई होने के कारण दाऊ जी कहा जाता है) का यह पुरातन और प्रसिद्ध मंदिर है। कहा जाता है कि लगभग 5000 वर्ष पहले श्रीकृष्ण के पर-पोते वज्रनाभ ने यहाँ मंदिर में विग्रहों की स्थापना की थी। मुख्य विग्रह बलराम जी की लगभग सात फ़ीट ऊँची काले पत्थर की है जिसे गर्भ-गृह के सामने से दर्शन किया जा सकता है। गर्भ-गृह के अन्दर एक कोने पर दाऊ जी की तरफ मुख किये हुए उनकी पत्नी रेवती जी का भी विग्रह है जिनका दर्शन बगल के दरवाजे से किया जा सकता है। 
दाऊजी मंदिर परिसर का स्वागत द्वार, बलदेव, मथुरा


         जब हमने दर्शन किया तो हमारे एक परिचित जिनका यहाँ की रसोई का जिम्मा है, उन्हें मिलने का आग्रह किया। वे आकर बहुत खुश हुए और हमें रसोई की तरफ ले गए और एक रेडी-मेड धोती ला कर मुझे पहनने दिया क्योंकि वे हमें गर्भ गृह में ले जा कर दर्शन करना चाहते थे। पैंट शर्ट में अंदर जाने की अनुमति नहीं है। तो अंदर जा कर पत्नी के साथ हमलोगों ने दोनों विग्रहों का दर्शन किया, प्रणाम किया और धन्य हुए। 
गर्भ-गृह के बाहर से दाऊ जी का दर्शन, बलदेव, मथुरा


       फिर मंदिर के बगल में एक तालाब दिखाया जिसे बलभद्र-कुंड या क्षीर-सागर कहते हैं। दाऊ जी को ब्रज का राजा कहा जाता है क्योंकि जब कृष्ण ब्रज से जा कर द्वारिका नगरी बसाई और वहाँ के राजा बने तो मथुरा दाऊ जी के ही संरक्षण में रही। यह मंदिर वल्लभ सम्प्रदाय का प्रमुख मंदिर है। 
बलदेव, मथुरा में दाऊ जी मंदिर के बगल में क्षीर-सागर
अर्थात बलभद्र-कुंड


       शुरू में जब हमलोग यहाँ महाराज जी के साथ पहुंचे तो पंडे हमें घेरने लगे लेकिन उन्होंने पंडों को समझा बुझा कर अलग किया। तो जब यहाँ आएं तो इनसे थोड़ा सतर्क रहें। 
       6. बन्दी -आनंदी का मंदिर - हमारे गाइड सोनू जी महाराज ने कहा कि कई गाइड तो यात्रियों को यहाँ लाते भी नहीं किन्तु मैं जरूर लाता हूँ। उनके अनुसार जब श्रीकृष्ण का बंदीगृह में जन्म हुआ तो देवकी-वसुदेव के बंधन इन्हीं बंदी देवी द्वारा खोली गयी थी। आनंदी भी इनके साथ थीं। इस मंदिर में इन दोनों देवियों की मूर्तियों के अलावा एक और देवी मनोवांछा देवी की भी प्रतिमा है। 
बंदी गॉव में बंदी-आनंदी मदिर का एक दृश्य, मथुरा


       इस मंदिर में मुंडन संस्कार के लिए भी श्रद्धालु आते हैं। हमलोग जब यहाँ पहुंचे तो भीड़ न के बराबर थी। मंदिर प्रांगण बड़ा और फैला है। 
  
       7. चन्द्रावली - चन्द्रावली मंदिर महावन क्षेत्र में यमुनापार मार्ग पर स्थित चन्द्रावली देवी का 5000 वर्ष पुराना मंदिर है। ये राधा जी की अनेक सखियों में से एक थीं और श्रीकृष्ण को गोकुल आने की जिद्द करती थीं। एक बार कृष्ण जी, राधा जी और उनके सखियों को अपने पिता नन्द जी से मिलाने के लिए ले चले। इस स्थान पर आ कर चंदा थक कर बैठ गयीं और कृष्ण से थोड़ा रुकने को बोला। कृष्ण बोले तुम यहीं पर प्रतीक्षा करो मैं नन्द बाबा को यहीं लाकर तुमसे मिला दूंगा। तब से अब तक वे श्रीकृष्ण के आस में यहीं प्रतीक्षारत हैं।
चन्द्रावली देवी का खुला मंदिर और
उनको लगा छप्पन भोग, मथुरा


         इनकी प्रतिमा खुले में है। कहा जाता है कि कई बार मंदिर बनाने का प्रयास किया गया किन्तु किसी-न-किसी कारणवश नहीं बन पाया। इन्हें भी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली देवी माना जाता है। जब हमलोग यहाँ पहुंचे तो देवी के सामने 56 भोग रखे थे।  सामने आर्केस्ट्रा बज रहा था और बगल के टेंट में भंडारा चल रहा था। दर्शन कर हमने माथा टेका और अगले पड़ाव की ओर निकले। 
चन्द्रावली देवी मंदिर परिसर का स्वागत द्वार।
 
        8. रावल गांव में राधा जी की जन्म स्थली - यही वह स्थान है जहाँ राधा जी एक बच्ची के रूप में वृषभानु जी को एक कमल के फूल पर मिली थीं। इसलिए इस स्थान को राधाजी की जन्म स्थली के रूप में जाना जाता है। यहाँ राधा जी का एक मंदिर और कुंड है। जब हमलोग यहाँ आये तो 15 मिनट पहले मंदिर का गेट बंद हो चुका था। कई और श्रद्धालुओं ने दर्शन करने का अनुरोध किया पर अंदर से गेट नहीं खोला गया। लगभग चार घंटे बाद पट खुलता।  
रावल गॉव में राधाजी का मंदिर जहाँ वे कमल के फूल पर
एक बच्ची के रूप में वृषभानु जी को मिली थीं
 
        अंततः हमलोगों ने दरवाजे पर ही माथा टेका और वापस गाड़ी में आये। 
 
      9. दुर्वासा मुनि आश्रम - यमुना जी के तट पर एक टीले पर बना यह मंदिर, क्रोधी ऋषि दुर्वासा के आश्रम का स्थान है। हमलोग जब यहाँ पहुंचे तो यह मंदिर भी बंद हो चुका था क्योंकि अधिकतर मंदिर 12 से 4 के बीच बंद रहते हैं।
यमुना किनारे दुर्वासा मुनि मंदिर का बंद गर्भ-गृह।
       प्रांगण में बने इस बड़े मंदिर के अंदर हमलोगों ने गर्भ गृह की परिक्रमा की और कुछ देर बैठ कर, माथा टेकते हुए बहार निकले। मुनि के विग्रह का दर्शन तो न हो सका पर अंदर की दीवारों पर विभिन्न कृष्ण लीला के प्रसंगों की मूर्तियाँ हमने देखीं। 
चारधाम मंदिर, वृन्दावन में योग मुद्रा में महादेव की बड़ी मूर्ति
और उन्हें देखते नंदी बाबा।
        इस प्रकार दूसरे दिन की चौरासी कोस यात्रा के मंदिरों का दर्शन कर वृन्दावन में होटल वापस आये।आराम कर शाम में हमलोग छटीकरा मोड़ के पास चार धाम मंदिर गए जो नव निर्मित है। शाम में रौशनियों के बीच ये दर्शनीय स्थान हैं जहाँ वैष्णो धाम, राधा-कृष्ण धाम, शनि धाम और शिव धाम के चार धाम मंदिर बने हैं। यहाँ पूरी भीड़ होती है। कैसे दो घंटे यहाँ बीत जाते हैं पता भी नहीं चलता। मंदिर में जाने के लिए टिकट नहीं लगते। वृन्दावन में रुकें तो एक शाम इस मंदिर के लिए भी अवश्य रखें। 
 
   चौरासी कोस यात्रा के तीसरे दिन का विवरण अगले ब्लॉगपोस्ट में पढ़ें - "ब्रज 84 कोस यात्रा, भाग - 3" ;
                      

इस ब्लॉग के पोस्टों की सूची






















































Friday, April 25, 2025

ब्रज 84 कोस यात्रा, भाग - 1

      ब्रज, जहाँ परमात्मा श्रीकृष्ण ने अवतार लिया, लीलायें कीं और ब्रजवासियों का हृदय-मन को मोह लिया वह ब्रज भगवान श्रीकृष्ण को भी बहुत प्रिय था। ब्रज छोड़ने के बाद फिर कभी वे वापस न लौटे पर वह कभी ब्रज को भूल भी न सके। जैसा कि सूरदास जी ने लिखा है कि श्रीकृष्ण कहते हैं, "उधो, मोहे ब्रज बिसरत नाहीं .." 

चौरासी कोस यात्रा से पूर्व श्रीयमुना पूजन एवं संकल्प


       राधा जी सहित गोपियों और ब्रजवासियों के कृष्ण-प्रेम और भक्ति ने ब्रज के कण-कण को पवित्र कर दिया। आज भी भक्तजन ब्रज की धूलि मस्तक पर लगा कर स्वयं को धन्य समझते हैं। ब्रजवासियों ने भी श्रीकृष्ण की यादों को सहेज कर रखा है। जहाँ कहीं भी श्रीकृष्ण और राधा जी के चरण -कमल पड़े या उनसे जुड़ी कोई लीला स्थली हो वहाँ -वहाँ मंदिर पायेंगे। ब्रज एक तीर्थ है जहाँ की यात्रा से समस्त तीर्थों की यात्रा का फल मिलता है क्योंकि भगवान ने सभी तीर्थों को ब्रज में आने का आदेश दिया था। इसका प्रसंग यह है कि एक बार नन्द बाबा और यशोदा मैया तथा वसुदेव और देवकी जी ने श्रीकृष्ण से आग्रह किया कि उन्हें तीर्थ यात्रा करा दें। श्रीकृष्ण ने कहा आपलोगों को तीर्थों में भटकने की जरुरत नहीं है, मैं सारे तीर्थों को ब्रज में ही बुला देता हूँ, आपलोग यहीं दर्शन कर लेना। और यही उन्होंने किया भी।कौन सा ऐसा तीर्थ है जो ब्रज में नहीं है? ये सभी तीर्थ ब्रज के 84 (चौरासी) कोस जो की लगभग 252 किलोमीटर की परिधि में हैं, में बसे हैं। इसी लिए ब्रज चौरासी कोस यात्रा का महत्व है कि इस यात्रा में सभी तीर्थों के दर्शन के पुण्य प्राप्त हो जाते हैं। 

श्री राधा मानसरोवर, वृन्दावन


       नंगे पैर पैदल इस यात्रा को करने से ब्रज धूलि आपके शरीर को छूती है। ऐसी यात्रा में लगभग 40 से 50 दिन लग जाते हैं और जब मौसम नरम होता है तब ऐसे तीर्थ यात्रियों की कमी नहीं रहती। किन्तु सभी में यह शारीरिक क्षमता नहीं होती और न सबके पास इतना समय होता है। अतः लोग वाहनों से भी इस यात्रा को करते हैं जिसमें पाँच से सात दिन का समय लगता है। कार-टैक्सी, ट्रेवेलेर और बसों से यात्री सालों भर इस 84 कोस ब्रज यात्रा पर आते रहते हैं। 

श्री राधा रानी मंदिर, मट, वृन्दावन


      हमने भी हाल में ही सात दिनों में भाड़े की कार से ब्रज 84 कोस की यात्रा पूरी की। इस यात्रा में एक गाइड या पथ प्रदर्शक होना आवश्यक है जिसे इस यात्रा के मंदिरों और स्थान का पता हो। प्रायः इसमें एक ब्रजवासी ब्राह्मण को गाइड रखा जाना चाहिए जो पथ -प्रदर्शन के साथ-साथ संकल्प इत्यादि का भी कार्य करा सकें। हमारे गाइड श्री सोनू कौशिक जी महाराज थे जो एक ब्रजवासी ब्राह्मण हैं। इन्होने हमें एक-एक मंदिर का भ्रमण कराया, साथ ही प्रत्येक स्थान की कथा भी सुनाते गए। किस मंदिर में क्या चढ़ाना चाहिए और किस रीति से करना चाहिए, ये सब बताते गए। इसके अलावा हमलोग सुरक्षित रहें इसका भी इन्होंने विशेष ध्यान रखा। प्रत्येक दिन के भ्रमण किये गए मंदिरों / स्थानों की सूची भी शाम को व्हाट्सएप्प पर भेज देते थे ताकि हमें याद रहे। हमलोग उनके आभारी हैं। 

श्री ललिता महात्रिपुरसुन्दरी जी मंदिर,
(राधा मंदिर, मट, वृन्दावन)


            अब मैं अपनी यात्रा का विवरण लिखता हूँ जिससे यदि आप भी इस यात्रा पर जाना चाहें तो कुछ जानकारी मिल सके। हमारे एक परिचित ने वृन्दावन में बढ़िया होटल बुक किया था, नाम है SNJ Laxmi Dham, भाड़े की कार भी उन्होंने ही बुक किया था तथा गाइड श्री सोनू कौशिक महाराज जी को भी उन्होंने ही साथ लगाया था। समस्त यात्रा अच्छी तरह पूर्ण होने के कारण उनका भी धन्यवाद करता हूँ। 


       यात्रा जिस दिन प्रारम्भ होनी थी उससे पहले दिन शाम को हमलोग होटल पहुंचे। हमलोग अगले दिन की यात्रा की प्लानिंग तथा सोनू कौशिक जी से परिचित होने हेतु उन्हें होटल में शाम में ही बुलाया था। किन्तु शाम को मौसम एकाएक इतना ख़राब हुआ कि उन्हें होटल आने में बहुत परेशानी हुई। वर्षा, ओले और आंधी में रास्ते में पेड़ और पोल गिर गए। बेचारे एक फ्लाईओवर के नीचे घंटों खड़े रहे। इसलिए काफी देर से हमसे मिल पाए। तय हुआ की अगले दिन यात्रा प्रारम्भ करने से पहले हमलोग सर्वप्रथम यमुना जी का पूजन करेंगे तथा यात्रा का संकल्प लेंगे ताकि यमुना जी इस यात्रा की साक्षी रहें। ब्रज में यमुना जी का अत्यधिक महत्त्व है क्योंकि यही हैं जिन्होंने परमात्मा श्रीकृष्ण के अवतार का सबसे पहले दर्शन किया था। जब वसुदेव जी उन्हें सर पर टोकरी में रख कर गोकुल जा रहे थे तब यमुना जी ने टोकरी में श्रीकृष्ण के पैर छूने के बाद ही उन्हें रास्ता दिया था।         


                अगले दिन शनिवार था और पूर्णिमा भी। दिल्ली राजधानी क्षेत्र में शनिवार को सरकारी छुट्टी होती है जिसके कारण तथा पूर्णिमा के कारण भी वृन्दावन में काफी भीड़ थी। होटल से  आठ बजे हमलोग निकले। सोनू जी हमें थोड़ी दूर यमुना जी के ऐसे घाट पर ले गये जहाँ भीड़ भाड़ नहीं थी। उन्होंने फूल, पूजा सामग्री तथा नैवेद्य ले लिए थे। यमुना पूजन और संकल्प के बाद हमलोगों ने पहले दिन की यात्रा प्रारम्भ की। 

पहला दिन :--

       1. राधा मानसरोवर और राधा मंदिर - यह सरोवर राधाजी के आंसुओं से बना है। कथा यह है कि जब महारास हो रहा था तो सभी देवी देवता स्वर्ग से इसके साक्षी बने किन्तु किसी को भी पुरुष रूप में महारास में प्रवेश की अनुमति नहीं थी। महादेव जी की उत्कट इच्छा हुई महारास में जाने की किन्तु प्रवेश द्वार पर रक्षक ललिता सखी ने कहा सिर्फ स्त्री ही प्रवेश कर सकती है। यदि आपको जाना है तो यमुनाजी के पास जाइये, वे आपको स्त्री रूप दे सकती हैं। महादेव ने यमुनाजी के पास जा कर अनुरोध किया तो वे मान गयीं। महादेव जब यमुना जी में डुबकी लगा के निकले तो एक साँवली गोपी रूप पा लिया। यह रूप ले कर वे महारास में प्रवेश किये। राधाजी के साथ बैठे श्रीकृष्ण उन्हें देखते ही पहचान गए किन्तु प्रत्यक्ष रूप में उन्होंने "आओ गोप सुन्दरी!" कह कर शंकर जी का स्वागत किया। यह सुनते ही राधा जी के मान को ठेस लगा क्योंकि वे महादेव न पहचान सकीं। राधा जी ने सोचा मैं कृष्ण की प्रिय और इतना सज-धज कर बैठी हूँ और मेरे सामने कृष्ण इस साँवली गोपी को "आओ गोप सुंदरी" कह कर इतना मान दे रहे हैं। वे रूठ कर महारास से चली गयीं और इसी स्थान पर बैठ कर रोने लगीं। उनके आंसुओं से यहाँ एक सरोवर बन गया जिसे राधा मान सरोवर का नाम पड़ा। यहाँ राधा जी का एक मंदिर भी है जिसमें महिलायें गोबर से मंदिर की पिछली दीवार पर स्वस्तिक बना कर मनौती मानती हैं। इसी मंदिर के बगल में एक छोटा सा उपवन है जिसे छोटा निधि वन भी बोला जाता है। इसे चारों तरफ और ऊपर से लोहे की जाली से घेरा गया है। बगल में ही महप्रभु जी की बैठक भी है। 



        बाद में श्रीकृष्ण ने राधा जी को मनाया कि यदि मैं शंकर जी को नाम से पुकारता तो सभी गोपियाँ महारास छोड़कर उनके पैर छूने चली जातीं। इसीलिए "आओ गोप सुंदरी" कह कर स्वागत किया। 

श्रीराधा मंदिर के बगल में छोटा निधिवन


    2. बेल वन में महालक्ष्मी मंदिर - महाराज जी ने बताया कि ब्रज में कुल बारह वन और चौबीस उपवन हैं। उन्हीं में से यह एक वन है बेल वन। यहाँ महालक्ष्मी जी का मंदिर है और मंदिर की पिछ्ली दीवार से सटे उनका पत्थर पर बना हजारों साल पुराना चरण चिन्ह है।  



बेलवन में श्रीमहालक्ष्मी मंदिर, वृन्दावन


     3.  वंशी वट - भांडीरवन में स्थित यह स्थान है जहाँ आज भी एक 5500 वर्ष पुराना वट -वृक्ष अर्थात बरगद का पेड़ है। श्रीकृष्ण यहाँ इस इस पेड़ की डालियों पर बैठकर मधुर बाँसुरी बजाते हुए गोपियों को बुलाया करते थे और रास करते थे। यहाँ वे गायें चराने भी आते थे। वह प्रसिद्ध पंक्तियाँ - "चार पहर वंशी वट भटक्यो, साँझ परे घर आयो ......" इसी स्थान से सम्बंधित हैं जब छोटे से कृष्ण यशोदा मैया को माखन चोरी से इनकार करते हुए तर्क देते हैं। यात्री गण इस वृक्ष की परिक्रमा करते हैं और इसके तना में कान लगा कर इससे आती आवाज सुनते हैं जो प्रायः ढोल जैसी होती है अथवा 'राधा' जैसी। पास ही एक मंदिर भी है जहाँ चैतन्य महाप्रभु भी पधारे थे।   

वंशी - वट, वृन्दावन


        4. भांडीरवन और भद्र वन - इस वन में एक बड़े बरगद वृक्ष के नीचे छोटा सा मंदिर है जिसमे ब्रह्मा जी राधा और कृष्ण का बचपन में विवाह करा रहे हैं। भक्त जन बरगद (भांडीर-वट) की तीन परिक्रमा करते हैं और मंदिर के पास रखी सिंदूर को पति अपनी पत्नी को पहनाते हैं। इसी स्थान पर बलराम जी ने प्रलम्बासुर का वध किया था सो बगल में दाऊजी का भी एक मंदिर है जिसके प्रांगण में स्थानीय ब्राह्मण महिला लकड़ी-उपले के चूल्हे पर बनी बाजरे की रोटी खिला रही थी जिसे मधुकरी बोला जाता है। ब्रजवासी के घर में बनी इस रोटी को प्रसाद की तरह खाया जाता है। ये बेचा नहीं जाता बल्कि प्रसाद पाने वाले अपनी इच्छा से इन्हें जो देना चाहें देते हैं। इस मंदिर के बगल में श्रीकृष्ण ने वंशी से एक कूप बनाया था जो वेणु -कूप कहा जाता है। इसका पवित्र जल लोग आचमन करते हैं। बगल में एक और बड़ा मंदिर है जहाँ ब्रह्मा जी का राधा और कृष्ण का विवाह कराते मूर्तियां हैं। 

भाण्डीरवट, जहाँ बचपन में राधा-कृष्ण का ब्रह्मा ने
विवाह कराया था, वृन्दावन  


      5. लोहवन - इस स्थान पर एक बड़ा सरोवर है जिसे कृष्ण कुंड कहा जाता है। यहाँ कृष्ण नौका विहार भी करते थे। कहा जाता है कि इस स्थान पर कृष्ण ने जरासंध को कई बार हराया था। सरोवर के पास एक योगमाया जी का मंदिर भी है जिसमें द्वापर युग के योगमाया का विग्रह है। हमलोग जब यहाँ पहुंचे तो पट बंद हो चूका था। इसके अलावा यहाँ एक छोटा सा मंडप है जिसमे एक ऐसी प्रतिमा लगी है जो सिर्फ जांघों तक है अर्थात कमर से नीचे तक। कहा जाता है कि इस स्थान पर कृष्ण ने लोहासुर अथवा लोहजंघासुर का वध किया था जो पास ही एक गुफा में रहता था। यहाँ एक पंडित जी मिलेंगे जो लोहजंघासुर की जंघा तक वाली प्रतिमा पर लोहे की कढ़ाई से सरसों तेल से अभिषेक कराते हैं। इस तेल को शरीर के दर्द वाले स्थान पर लगाने से दर्द दूर होता है। हमने गुफा में जा कर भी देखा। यहाँ ऋषि तप करते थे। 

लोहवन में कृष्ण-कुंड


      6. भतरोड बिहारी मंदिर, अशोक वन -यह मंदिर एक टीले पर बना है जहाँ तक जाने के लिए सीढ़ियाँ बनीं हैं। दोपहर होने के कारण यह मंदिर भी बंद था। हमने बंद दरवाजे पर ही माथा टेका। इस स्थान पर श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण पत्नियों के द्वारा दिया गया मुख्यतः भात का भोजन ग्वाल बालों के साथ किया था। आधी सीढ़ी चढ़ने पर बगल में एक नाव रखा है जिसमें एक हैंडपंप और पूजा स्थान बना है। एक संत ने इस पर लगातार 12 वर्ष तक यमुना जी में रह कर तप किया था। तब यमुना जी इस मंदिर के पास ही बहती थीं। तप के बाद नाव इसी जगह आकर लगी। उन्होंने ही यह मंदिर बनवाया और अभी तक यह नाव यहाँ दर्शन हेतु रखा हुआ है। 

भतरौड़ बिहारी मंदिर और संत की नाव, अशोक वन


     7. अक्रूर जी का मंदिर - दोपहर होने के कारण यहाँ के भी पट बंद थे। इस मंदिर की दीवारों पर कृष्ण लीलाओं का चित्र अंकित है। यहाँ श्रीकृष्ण बलराम के साथ अक्रूर जी को पूजा जाता है। परिसर के एक छोर पर पंचमुखी हनुमान जी का मंदिर है जिसके बगल में एक बड़ा पुराना वृक्ष है जिसमें पाँच प्रकार के वृक्ष एक साथ हैं। पुजारी जी ने बताया कि इसकी जड़ों में दाढ़ी-मूंछ वाले नाग बाबा रहते हैं। 

अक्रूर जी का मंदिर, वृन्दावन


     8. पागल बाबा मंदिर - सफ़ेद संगमरमर पत्थरों से आच्छादित सात मंजिला यह भव्य मंदिर एक बाबा जी ने बनवाया था जो वृंदावन में पागल बाबा के नाम से मशहूर थे। उनका यह नाम उनके अजीबोगरीब कार्य के कारण मिला था। वे भक्ति भाव में इतना रम चुके थे कि सांसारिक व्यावहारिकता भूल चुके थे। बाँके बिहारी का नाम लेते दिनभर भटकते। कहीं भंडारे का बचा पत्तल मिलता तो उसी से भगवान को खिलाते और खुद भी खाते।शुरू में लोगों को यह अच्छा नहीं लगता पर धीरे धीरे लोग उनकी भक्ति को देखकर आदर देने लगे और सहयोग से यह मंदिर बनाया। इसमें जाने के लिए टिकट लगता है। भूतल पर एक तरफ कृष्ण लीला और दूसरी तरफ राम लीला से सम्बंधित सुन्दर झाँकियाँ हैं। प्रत्येक तल पर अलग अलग भगवान् की मूर्तियां हैं। सबसे ऊपर की तल पर निराकार ब्रह्म को दर्शाता 'ॐ' की आकृति बानी है। 

पागलबाबा मंदिर, वात्सल्य ग्राम, वृंदावन


     9. प्रेम मंदिर - यह 84 कोस यात्रा में नहीं आता किन्तु वृन्दावन में आकर इसे देखना कोई नहीं छोड़ता। इसीलिए पहले दिन की यात्रा "पागल बाबा मंदिर' तक पूरी करने बाद चार बजे हमलोग होटल में आकर सो गए और शाम 6 बजे प्रेम मंदिर और इस्कॉन मंदिर देखने निकले। शनिवार की छुट्टी और पूर्णिमा होने के कारण वृन्दावन में अपार भीड़ थी। होटल से प्रेम मंदिर लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर था पर पत्नी इतना पैदल नहीं चल सकती थी। आधा किलोमीटर चलने के बाद एक चाय दुकान पर बैठ गयी।हमारे गाइड सोनू जी महाराज स्वयं नहीं आ पाए थे। उन्होंने अपने भांजे हर्ष जी को भेजा जो स्कूटी से आये। हमने चाय पी और जाने का साधन खोजने लगे किन्तु इतनी भीड़ में कुछ न मिला ऊपर से सड़क पर पैदल चलने वालों रेला और जगह जगह पुलिस की बार्रिकडिंग। हर्ष जी ने हम दोनों को स्कूटी पर बिठा कर थोड़ी दूर ले गए पर उनकी स्कूटी रह रह कर बंद हो जा रही थी। अतः मैं उतर कर पैदल चला और पत्नी स्कूटी से। प्रेम मंदिर के पास उन्होंने स्कूटी लगायी और हमलोग सिक्योरिटी से निकल कर अंदर गए। आचार्य कृपालु जी महाराज का बनवाया यह भव्य मंदिर और परिसर अत्यंत आकर्षक है। शाम के समय जब यहाँ रंग बिरंगी रोशनियों में झाँकियाँ हिलती हैं तो बहुत मनमोहक लगता है। घुसते ही बायें तरफ के पार्क में कालिया मर्दन की जीवंत झाँकी को लोग देखते ही रह जाते हैं। मंदिर पर पड़ने वाले प्रकाश का रंग भी बदलता रहता है जिससे मंदिर थोड़ी थोड़ी देर में अलग अलग रंग का दिखता है। पीछे के हिस्से में एक फव्वारे से बानी पानी की दीवार पर चलचित्र प्रोजेक्ट किया जाता है जिसमें कृपालु जी महाराज का भजन दिखाया जाता है। दाहिनी तरफ गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी ऊँगली से उठाये श्री कृष्ण की बड़ी सी झांकी है। कई झाँकियाँ हैं परिसर में। मंदिर के अंदर का दृश्य भी भव्य है। इस दिन तो ठसाठस भीड़ थी फिर भी हमने अंदर जाकर दर्शन किये। शाम को लाइट शो में यह मंदिर मनोहारी लगता है। जब भी वृन्दावन आयें तो शाम को जरूर यहाँ आयें। यहाँ कोई एंट्री फीस नहीं है। 

प्रेम मंदिर और कालिया मर्दन की झाँकी (बायें), वृन्दावन


        यहाँ से निकल कर हमने इस्कॉन मंदिर जाने को सोचा। थोड़ी दूर आगे एक गली बायें निकलती थी। इस चौक से आगे स्कूटी नहीं जा पाई तो हर्ष जी ने बगल के एक दुकान के पास स्कूटी लगाई और हम तीनों पैदल आगे बढ़े। कुछ दूर बढ़े पर भीड़ के कारण आगे बढ़ना मुश्किल हो गया। पैदल, दोपहिया, इ-रिक्सा और कार की मिलीजुली भीड़ ऐसी थी कि एक जगह से आगे बढ़ ही न सके। फिर जैसे भीड़ वापस आ रही हो ऐसा लगा। साढ़े आठ से ऊपर हो गए थे जो मंदिर बंद होने का समय था। हमने वापस लौटना ही उचित समझा। ज्यों ही हमलोग स्कूटी तक आये, ओले के साथ वर्षा शुरू हो गयी। कहीं सर छुपाने की जगह न थी। कुछ ओले की मार खाते हमलोग पूरी तरह सराबोर हो गए।पौन घंटे बाद जब वर्षा समाप्त हुई तो होटल लौटने से पहले भोजन करना चाहा। बगल के एक मारवाड़ी बासा में सीट के लिए ही 40 मिनट की प्रतीक्षा थी। स्कूटी सही हालत में न थी अतः उसे लॉक छोड़ कर हमलोग पैदल लौटे। एक छोटे से होटल में दस मिनट खड़े रह कर बैठने की जगह मिली जहाँ भोजन कर निकले। हमने हर्ष जी को अपनी स्कूटी ले कर वापस लौटा दिया और दोनों आदमी सवारी को पूछते पूछते पैदल होटल की ओर चले। काफी पैदल चलने के बाद एक इ-रिक्शा वाले ने आगे की सीट पर हम दोनों को बैठाया और होटल के पास उतारा। 



 


(अगले पोस्ट में दूसरे दिन की यात्रा का विवरण पढ़ें - ब्रज 84 कोस यात्रा, भाग - 2)              

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