Monday, May 18, 2026

प्रयागराज, लखनऊ, नैमिषारण्य और बनारस की राउंड-ट्रिप यात्रा - भाग-3

प्रयागराज, लखनऊ, नैमिषारण्य और बनारस की राउंड-ट्रिप यात्रा - भाग-2 से आगे  ...... 


नैमिषारण्य में होटल

     नैमिषारण्य का मुख्य तीर्थ स्थल है चक्रतीर्थ। मैंने जो होटल बुक किया था, वो यहाँ से एक किलोमीटर के अंदर था। होटल का नाम "जे पी इंटरनेशनल होटल नैमिषारण्य" था। लखनऊ में हमारे स्थान से होटल की दूरी लगभग 100 किमी मैप में दिख रही थी। दो घंटे में हम लोग होटल पहुँच गए। सामने की बिल्डिंग में रिसेप्शन और रेस्टॉरेंट था जबकि पीछे एक भवन, जिसका डिज़ाइन किसी स्कूल की तरह था, में कमरे थे। एक लंबा बरामदा और कक्षा की तरह कमरे। हमें भूतल और प्रथम तल पर कमरे दिखाए गए। हमने प्रथम तल को चुना क्योंकि वहां से सामने खुला स्पेस और गार्डन नज़र आता था। कमरा भी साफ-सुथरा और वाशरूम भी सही थे। पहले हमने चाय मंगाई,फिर कमरे में ही रात का खाना मँगा कर सो गए। 

चक्रतीर्थ 

      यहाँ ड्राइवर के लिए सोने की जगह थी। सबेरे उसे कॉल कर तैयार होने बोला, फिर हमलोग भी तैयार हो कर नीचे आए। देखा कि पार्किंग की जगह दो तीन ऑटो वाले जमा थे। हमें देखकर सभी तीर्थ दिखाने की बात करने लगे। हमने कहा कि अपनी गाड़ी से जायेंगे, उन्होंने कहा कि आपको सब जगह नहीं मालूम होगी, ऊपर से पार्किंग का झंझट होगा। हम उनकी बातों में नहीं आए और अपनी गाड़ी से ही निकले। पहला पड़ाव था चक्रतीर्थ जहाँ मैप देखते हुए पहुंचे। 

नैमिषारण्य में चक्रतीर्थ स्नान


      चक्रतीर्थ का पौराणिक महत्व यह है कि ऋषियों की प्रार्थना पर भगवान् ब्रह्मा ने अपना मनोमाया चक्र धरती पर छोड़ा। जहाँ पर यह रुका वहाँ पर जल का एक कुंड बना। यह कुण्ड कलियुग के प्रभाव से अछूता होता है। ऋषियों ने अपनी साधना के लिए इस स्थान को चुना। 88000 ऋषियों ने यहाँ ध्यान और तप किया तथा पुराणों की रचना की। चक्र की तरह गोल इस कुंड में भक्तजन स्नान करते हुए परिक्रमा करते हैं। इससे नवग्रह की पीड़ा दूर होती है। एक अन्य कथा के अनुसार जब वृत्रासुर के वध के लिए ऋषि दधीचि की हड्डियों से वज्र बनाना आवश्यक हो गया तो उनकी खोज के लिए इन्द्रादि देवता विष्णु से मदद मांगने पहुंचे। विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र पृथ्वी पर भेजा और कहा जहाँ पर यह चक्र रुकेगा, वहीं ऋषि दधीचि मिलेंगे। सुदर्शन चक्र यहीं पर रुका, और दधीचि ऋषि भी पास ही मिले। 

     जब हम लोग यहाँ पहुंचे, तो एक व्यक्ति ने बताया, 'आगे गाड़ी पार्क कर दो और अंदर जाओ। हम लोग एक झोले में पहनने का कपड़ा ले कर चक्र तीर्थ कुंड के पास पहुंचे। वहाँ चौकियों पर कई पंडित जी बैठे थे। उन्हीं में से एक के पास गए। उन्होंने संक्षेप में कथा सुनाई, संकल्प करवाया और चक्रतीर्थ में एक या दो बार स्नान करते हुए परिक्रमा करने बोला। हम लोग स्नान के लिए उतरे। कुंड के चारों ओर घेरा बना हुआ है। इस घेरे में चक्र के आकार के अनेक सीमेंट वाले ग्रिल लगे हैं। घेरे के बाहर ही स्नान करते हुए परिक्रमा की जाती है। पानी लगभग छाती तक रहता है। पानी के अंदर परिक्रमा पथ और इसमें उतरने के लिए सीढ़ी सब पक्के हैं। किन्तु फिसलन बहुत थी। सावधानी पूर्वक रेलिंग पकड़ कर स्नान के लिए उतरे। पानी मेरे छाती तक था तो स्नान करते हुए मैं चल सकता था किन्तु कद थोड़ा काम होने के कारण पत्नी को पानी का स्तर लगभग गले तक आ रहा था। इसके कारण उनका पांव फर्श पर टिक नहीं पा रहा था। मैंने उन्हें खींच कर कुंड के रेलिंग में लगे सीमेंट वाले ग्रिल को पकड़वाया, तब जा कर वे रेलिंग पकड़ते हुए परिक्रमा कर पायीं। 

     परिक्रमा पूरी कर हम लोग ऊपर आए, कपड़े बदले और पंडित जी की दक्षिणा इत्यादि दी। गीले कपड़े झोले में कर उन्हीं की चौकी पर छोड़े और कुंड के चारों तरफ बने मंदिरों में दर्शन किए। यहाँ हर जगह मंदिरों में आपसे दान की आशा की जाती है। यहाँ से दर्शन -पूजन पूरा कर पंडित जी से विदा ले हम लोग आगे व्यास गद्दी की तरफ चले जो यहाँ से एक किमी दूर होगा। 

व्यास गद्दी

    व्यास गद्दी जब पहुंचे तो भक्त जन अभी आने शुरू नहीं हुए थे। सभी मंदिर खाली ही थे। यहाँ यू पी टूरिज्म द्वारा एक बोर्ड पर इस तरह लिखा हुआ है :-

मनु शतरूपा ब्रह्मा

स्वयम्भुव मनु अरु शतरूपा।

जिनते भई नर सृष्टि अनूपा।|

मान्यता है कि नैमिष की पावन धरा पर सृष्टि का सृजन हुआ। पृथ्वी के आधार (धुरी) नैमिष में प्रथम स्त्री-पुरुष से मनुष्य सृष्टि की उत्पत्ति हुई। इस पावन स्थली में मनु-शतरूपा ने तपस्या करके जीवन का आरम्भ ही नहीं किया, वरन निराकार ब्रह्म को साकार करके मानव जाति के लिए सुलभ करते हुए सर्वश्रेष्ठ मनुष्य जीवन जीने के लिए बाध्य कर दिया।    

नैमिषारण्य में व्यास गद्दी प्रवेश द्वार


       यहाँ कई मंदिर हैं जिनमें व्यास गद्दी प्रमुख हैं जहाँ वेद-व्यास ने कई पुराणों की रचना की। इनमें श्रीमद्भागवत महापुराण और सत्यनारायण व्रत कथा प्रमुख हैं। एक बड़ा सा बरगद का वृक्ष है जो अति पुरातन एवं पवित्र मन जाता है। एक यज्ञ शाला, भगवत कथा हॉल, सत्यनाराण मंदिर, मनु-शतरूपा मंदिर, गोवर्धन मंदिर एवं माता कनक सुंदरी मंदिर है। हर स्थान पर दर्शन कर हम लोग आगे गोमती के राजघाट पर गए। 


राजघाट, गोमती नदी

नैमिषारण्य में गोमती राजघाट


      कई लोग यहाँ भी स्नान कर रहे थे। मैंने यहाँ भी कई डुबकियाँ लगाकर स्नान किया और कुछ समय इस शांतिमय वातावरण में बिताया। अगला पड़ाव था हनुमान गढ़ी। 


हनुमानगढ़ी

नैमिषारण्य के हनुमानगढ़ी का प्रवेश द्वार


      यहाँ गाड़ी खड़ी कर हमलोग हनुमान गढ़ी की तरफ प्रवेश ही करते कि यहाँ बना एक "श्रीकृष्ण, पांच पांडव और द्रौपदी" के मंदिर के पुजारियों ने कहा पहले यहाँ दर्शन होगा। वहां से दान-दर्शन के बाद हम लोग हनुमानगढ़ी मंदिर में गए। यह एक प्राचीन मंदिर है जो हनुमानजी की पाताल यात्रा से सम्बंधित है। जब अहिरावण ने राम-लक्ष्मण को पाताललोक में बंदी बना लिया था तब हनुमानजी ने अपने बल-बुद्धि से अहिरावण को मारकर, राम-लक्ष्मण को ले कर वापस आये थे। पंडित जी ने बताया कि यह मूर्ति स्वयं प्रकट हुई है। दर्शन पूजन के बाद पंडित जी की अनुमति से एक फोटो लिया। मंदिर से निकलते कुछ और जगह भी देव मूर्तियां हैं जहाँ से दर्शन कर मंदिर से नीचे उतरे। सीढ़ियों के पास एक हवन कुंड बना है जहाँ पुजारी पांच बार हवन में आहुति डालने कहते हैं। जब पार्किंग के पास आए तो एक सुन्दर तालाब के बीच में शिव-परिवार की मूर्ति देखी जहाँ शिव-जटा से पानी का फव्वारा निकल रहा था। पास ही एक खाटू श्याम मंदिर का मंदिर था जहाँ हमने अंदर जा कर दर्शन किये। 


माँ श्री ललिता देवी शक्ति पीठ

नैमिषारण्य में माँ श्री ललिता देवी शक्तिपीठ


       वहाँ से निकलकर अब हम लोग यहाँ के एक प्रमुख मंदिर गए, जो कि एक शक्तिपीठ है। यहाँ है माँ श्री ललिता देवी शक्तिपीठ मंदिर। मान्यता है कि यहाँ पर सती माता का हृदय गिरा था। मंदिर के बाहर सड़क पर गाड़ी खड़ी कर आगे बढ़े। पूजा और प्रसाद वाली दुकानों की कतारें थीं। कुछ फूल-प्रसाद लेकर हम लोग भी अंदर गए और दर्शन पूजन कर निकले। मंदिरों में पूजा करने के कारण अब तक हमने कुछ खाया नहीं था। बहार सड़क पर ड्राइवर एक दुकान में चाय पी रहा था तो हमने भी चाय पी, पर अच्छा न था। अब हमने भोजन ही करने का सोचा।


रुद्रावर्त

रुद्रावर्त कुंड,नैमिषारण्य


      हमारा होटल यहाँ से पास ही था और उसका रेस्टॉरेंट 'मद्रास कैफे' बढ़िया था। तो हम लोगों ने वहीं जाकर भोजन किया। मुख्य-मुख्य मंदिर हमलोग जा चुके थे। एक अन्य दर्शनीय स्थान था रुद्रावर्त जो यहाँ से दस किमी दूर था। वहीं के लिए निकले। कुछ दूर तो अच्छी पक्की सड़क थी पर आगे ग्रामीण सड़क एक गांव और आगे खेतों से हो कर जाती थी। अंततः हम लोग रुद्रावर्त पहुँचे जो गोमती के ही किनारे है। यहाँ की विशेषता एक कुंड है जो गोमती नदी के किनारे ही बना है। इसके नीचे पानी में शिवलिंग है और मान्यता है कि कुंड में उन्हें यदि पांच फल समर्पित किया जाये तो कुछ फल स्वीकार कर महादेव बाकी फल प्रसाद के रूप में पानी के ऊपर भेज देते हैं। पास में कई दुकानदार पाँच फलों के पैकेट बेच रहे थे। हमने भी एक पैकेट लेकर कुंड में समर्पित किये जिनमें कुछ ऊपर आए, दो फल किसी तरह ले सके, एक धार में बह गया। कुंड के ऊपर एक नंदी प्रतिमा को प्रणाम कर हम लोग होटल लौटे।   

      साढ़े ग्यारह बजने वाले थे। चेक आउट कर हम लोग गाड़ी से बनारस के लिए निकले।

(बनारस यात्रा का विवरण पढ़ें अगले ब्लॉग - "प्रयागराज, लखनऊ, नैमिषारण्य और बनारस की राउंड-ट्रिप यात्रा - भाग-4 में" )

  


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Tuesday, May 12, 2026

प्रयागराज, लखनऊ, नैमिषारण्य और बनारस की राउंड-ट्रिप यात्रा - भाग-2

 पिछले भाग-1 से आगे  ..........



माँ कृपा होटल एंड बैंक्वेट, लखनऊ


लखनऊ का होटल

        लगभग चार घंटों की यात्रा कर हमलोग लखनऊ पहुंचे। मैप देखते हुए हम लोग अपने बुक होटल "माँ कृपा होटल एंड बैंक्वेट" में पहुंचे। यह लखनऊ के भापतामउ, आलम नगर में था। बैंक्वेट में कोई शादी विवाह का कार्यक्रम चल रहा था। हमारा कमरा ऊपर के फ्लोर में था। होटल का कमरा और टॉयलेट साफ-सुथरे और बढ़िया थे। किन्तु ड्राइवर के सोने के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी। बेचारा ड्राइवर गाड़ी में ही सोया जो कि गर्मी के दिन में थोड़ा कष्टप्रद होता है। इसके अतिरिक्त होटल के रेस्टॉरेंट से मँगाया गया भोजन काफी महंगा था। रविवार के दिन पत्नी नमक नहीं खाती, तो होटल के रेस्टोरेंट से दूध और रोटी मंगाया। 150 ml से भी कम दूध की कीमत 190 रूपये थी। 

संध्या में रूमी दरवाज़ा, लखनऊ


       शाम का समय था और हमारे पास समय भी था, तो कमरे में समय व्यतीत करने से अच्छा हमने कुछ यहाँ की जगह देखना उचित समझा। मैप देखकर हम लोग लखनऊ के प्रसिद्ध स्थान रूमी दरवाजा पहुंचे। 

रूमी दरवाजा

      जिस तरह हैदराबाद की पहचान चारमीनार से है, उसी तरह लखनऊ की पहचान रूमी दरवाजा से है। 60 फ़ीट ऊँचा यह सुन्दर दरवाजा लखनऊ के नवाब आसफ-उद्दौला द्वारा सन 1784 में बनवाया गया था। इसे "गेटवे टू ओल्ड लखनऊ" के नाम से भी जाना जाता है। 

रूमी दरवाज़ा, लखनऊ


      पतली पक्की ईंटों और सुर्खी-चूना के गारे से बना यह स्ट्रक्चर वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है। हैदराबाद के चारमीनार के मुकाबले यह जगह ज्यादा साफ़-सुथरी और फैल है। रविवार का दिन होने के कारण भीड़ ज्यादा थी। लोग टहल रहे थे, फोटो ले रहे थे, ठेले पे चाट-आइसक्रीम खा रहे थे या यूँ ही समय बिता रहे थे। एक घोड़े वाला और एक ऊंट वाला भी सवारी करवा रहा था।  

बड़ा इमामवाड़ा 

बड़ा इमामबाड़ा, लखनऊ


    हमलोग टहलते हुए रूमी दरवाजा को पार कर दूसरी तरफ गए। पास ही व्यस्त सड़क के दोनों तरफ दो ऊँचे दरवाजे आमने-सामने नजर आये। बताया गया कि एक तरफ बड़ा इमामबाड़ा है और दूसरी तरफ दौलतखाना। बड़े इमामबाड़े में ही प्रसिद्ध भूलभुलैया है। शाम हो जाने के कारण इनकी एंट्री बंद हो चुकी थी। हम लोग वापस गाड़ी में आए और पीछे की तरफ लौटे जहाँ कुछ और पुरानी जगहें दिखी थीं। 

घंटा घर, हुसैनाबाद

घंटाघर, हुसैनाबाद, लखनऊ


        कुछ ही दूरी पर हुसैनाबाद घंटा घर दिखा। हम लोग यहाँ उतरकर देखने गए। यह घंटाघर भारत का सबसे ऊँचा घंटाघर है, जो कि 221 फीट ऊँचा है। अंग्रेजों द्वारा सन 1881 में इसे अवध के लेफ्टिनेंट गवर्नर सर जॉर्ज कूपर के आगमन पर बनवाया गया था। हम लोग पास से देखने गए, पास से घंटा घर की चोटी देखने में पूरा सर ऊपर करना पड़ता है। 

       पास ही एक बड़ा सा तालाब है जिसके चारों किनारे पत्थर के स्लैब से सीढ़ीनुमा पक्के किये गए हैं। इसे घंटाघर तालाब के नाम से जाना जाता है। पास जाकर इसे देखा और कुछ फोटो लिए। 

घंटाघर तालाब, लखनऊ

   

हनुमंत धाम मंदिर

        अभी शाम के साढ़े सात बजे थे। मैप पर यहाँ से कुछ दूर एक हनुमान मंदिर देखा था तो सोचा कि यहाँ भी दर्शन किया जाय। यह मंदिर हनुमंत धाम मंदिर के नाम से जाना जाता है। घंटा घर तालाब के पास ही गाड़ी पर बैठा और मंदिर की ओर निकला। यह रास्ता पुनः रूमी दरवाजा के बगल से ही निकलता है। संध्या हो चुकी थी और इन सभी इमारत पर लाइट जला दिए गए थे। बिजली की रौशनी में रूमी दरवाजा अत्यंत सुन्दर लग रहा था। लगभग 15 मिनट बाद हम लोग मंदिर के पास पहुँचे। रविवार के कारण भीड़ ज्यादा थी और सड़क के किनारे पार्क की गई गाड़ियों की कतार लगी थी। थोड़ा आगे जगह देख कर गाड़ी पार्क करा कर मंदिर में गए। मंदिर प्रथम तल पर है जहाँ दर्शन हेतु जाने में पहले श्री गणेश भगवान की सुन्दर मूर्ति के दर्शन होते हैं। मुख्य मंदिर में श्री हनुमान जी की बड़ी सी सुन्दर प्रतिमा है जिनके दर्शन कर पीछे की ओर से घूम कर सामने आये। बाहर में भी कई देवताओं की प्रतिमाएँ हैं। यहाँ नीचे तल पर पुरातन हनुमान  प्रतिमा भी है। हमने यहाँ भी दर्शन किया और बाहर आए। 

हनुमंत धाम मंदिर, लखनऊ


        अब भूख लगने लगी थी। ढंग का कोई रेस्टॉरेंट पास में नहीं पता चला। एक जगह सड़क के किनारे कुछ फल खरीदे और चाय पी। आखिर होटल लौटने के क्रम में एक चौंक पर खाने लायक रेस्टॉरेंट दिखा जहाँ हमने डिनर लिया और होटल अपने कमरे पर आए। 

उपनयन संस्कार

          अगले दिन तैयार हो कर लगभग दस बजे हमलोग आमंत्रित कार्यक्रम में भाग लेने निकले। होटल से चेक आउट कर लिया था। स्थल लगभग 15 किलोमीटर दूर था। मैप देखते हुए हम लोग वहाँ पहुँचे। उपनयन संस्कार में आए सभी रिश्तेदारों से मिल कर हर्ष का अनुभव हुआ। कार्यक्रम कई दिनों तक चलता है, किन्तु मुख्य कार्यक्रम इसी दिन था। कैसे समय बीता पता ही न चला। संध्या छः बजे हमने सबसे विदा लिया और गाड़ी से नैमिषारण्य की तरफ निकले। 

(नैमिषारण्य यात्रा का विवरण अगले ब्लॉग में  .......)          

  


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Wednesday, May 6, 2026

प्रयागराज, लखनऊ, नैमिषारण्य और बनारस की राउंड-ट्रिप यात्रा - भाग-1

संध्या के समय हमलोग प्रयागराज मे प्रवेश किए

  उद्देश्य

          27 अगस्त को लखनऊ में एक उपनयन संस्कार में आने का न्यौता मिला। उपनयन मेरे चाचाजी के दो पोतों का था। घर की बात थी तो जाना जरुरी था। किन्तु घर से लखनऊ की दूरी लगभग 750 किलोमीटर है। दो व्यक्तियों के लिए फ्लाइट से जाने आने में लगभग 70 हजार रूपये खर्च होते जो बहुत ज्यादा था। ट्रेन में कन्फर्म टिकट नहीं दिख रहे थे, ऊपर से ट्रेन से कानपुर जाना होता फिर वहाँ से टैक्सी। पत्नी घुटने के दर्द के कारण ट्रेन से जाने की इच्छुक नहीं थी। अंततः मैंने अपनी कार से जाने का फैसला किया। एक ड्राइवर को साथ लेना जरुरी था। एक दिन में इतनी लम्बी ड्राइव सही नहीं होती, तो हमने जाते - आते एक जगह बीच में नाईट हाल्ट का प्लान बनाया। जाते समय मैंने प्रयागराज में और वापसी में बनारस में रुकने का सोचा। प्रयाग जाना इसलिए चाह रहा था कि पिछली बार कुम्भ में जब आया तो प्रतिबंधों के कारण कार को 20 किलोमीटर दूर ही छोड़ना पड़ा था। कितनी मुश्किलों से टेंट होटल में पहुंचे थे और लौटने में तो तारे दिन में दिखने लगे थे। कुम्भ यात्रा का विवरण यहाँ पढ़ सकते हैं - महाकुम्भ यात्रा -पौष पूर्णिमा और मकर संक्रांति पर शाही स्नान। होटल से पैदल ढाई किलोमीटर चलकर अरैल संगम घाट जाना और स्नान कर आना, बस दो दिन यही किया था। और कोई स्थान देख भी नहीं पाया था। इसलिए इस बार ढंग से प्रयाग में रुकने का सोचा। इसके अतिरिक्त लखनऊ से 100 किलोमीटर दूर नैमिषारण्य जाने का लक्ष्य रखा जहाँ पहले कभी न गया था। 

यात्रा आरम्भ

      तय कार्यक्रम के अनुसार 25 अप्रैल की सुबह हमलोग अपनी कार से ड्राइवर के साथ निकले। संयोग से जी -टी रोड क्लियर मिला, कहीं जाम न मिला। शाम पाँच बजते बजते हम लोग चुंगी चौराहे के पास पहले से बुक किए होटल में पहुँचे। इस बार मुझे वहाँ संगम स्नान करने की इच्छा थी जहाँ गंगा और यमुना दोनों नदियों के किनारे मिलते थे, बिलकुल नुकीले चोंच आकार के मिलान स्थल पर। इसलिए मैंने खोजबीन कर चुंगी चौराहे के पास इस होटल को चुना था जो पास भी था और बढ़िया भी। होटल का नाम था "राधे कृष्णा रेजीडेंसी" | इस होटल की विशेषता यह थी कि इसके कमरों में नंबर नहीं थे बल्कि उनके नाम रखे गए थे। हमारे कमरे का नाम था केशवी। 

होटल के कमरों के नंबर न थे
नाम थे


       शाम को आस-पास के स्थानों को देखने के लिए गूगल मैप सर्च किया तो आधे किलोमीटर दूर ही एक शक्तिपीठ का पता चला। तो हमने वहां दर्शन करने का सोचा और वापसी में डिनर करते हुए लौटने का सोचा।      

प्रयागराज में शक्तिपीठ

       मैप देखते हुए हमलोग मंदिर पहुंचे जहाँ अभी आरती चल रही थी। यह मंदिर है "श्री माँ अलोप शंकरी देवी" का। मंदिर के अंदर वाली दूकान से नारियल,फूल माला ले कर हमलोग लाइन में लगे। आरती के कारण लाइन लम्बी थी। आधे घंटे में हमें गर्भ-गृह में प्रवेश मिल गया। फूल मालाओं से ढंके एक चबूतरे के बीच माता के दाहिने हाथ का पंजा बना है जिसके ऊपर एक छतरी लटकती रहती है।

अलोप शंकरी देवी शक्तिपीठ, प्रयागराज


    दर्शन कर मंदिर के अन्य विग्रहों के आगे भी शीश झुकाये। प्रसाद लेकर वापस निकले। चुंगी चौराहे के पास कुछ अच्छे रेस्टॉरेंट भी हैं। उन्ही में से एक में डिनर लिया और होटल में रात्रि विश्राम के लिए आ गए।    

त्रिवेणी संगम स्नान

त्रिवेणी संगम का घाट जहाँ गंगा और यमुना जी
के एक एक किनारे मिलते हैं।


      सबेरे फ्रेश होकर हमलोग कार से त्रिवेणी संगम की ओर निकले। घाट के पास पहुँचते पहुँचते कई नाववाले पूछने आये कि बीच संगम में ले जाकर स्नान करा देंगे किन्तु पहले जब भी आया था नाव से ही बीच में स्नान किया था। इस बार मन बना कर आया था उस जगह स्नान करूँगा जहाँ गंगाजी और यमुना जी का एक-एक किनारा मिलता है, जो चिड़िया के चोंच सी मैप पर दिखती है। इसलिए नाव वालों को मना कर दिया। घाट के पास गाड़ी रोककर उसमें सामान और चप्पल रखकर हम लोग स्नान वाले कपड़ों में त्रिवेणी घाट की ओर बढ़े। स्नान वाला घाट सुरक्षा के लिए फ्लोटिंग घेरे से सुरक्षित किया गया था। गर्मी के मौसम के कारण पानी की गहराई अधिकतम कमर भर ही थी। हम लोगों ने जी भर कर मनचाही जगह पर त्रिवेणी स्नान किया और गाड़ी के पास आकर कपड़े बदले।

लेटे हनुमान जी

     दूसरा लक्ष्य था लेटे हनुमान जी का दर्शन करना। कुछ दूर पर ही ये मंदिर है, तो गाड़ी से यहाँ पहुँचे और प्रसाद खरीदकर दर्शन किया। 

लेटे हनुमानजी, प्रयागराज


       मंदिर के प्रवेश के पास ही एक दीप विक्रेता दीप लेने की जिद करने लगा तो हमने कहा कि अक्षय वट का दर्शन करना है। उसने रास्ता बताया और कहा कि एक दीप ले लो और अक्षय-वट के पास जला देना। और अगर वट वृक्ष का गिरा पत्ता मिले तो रख लेना। उसने एक माचिस भी साथ में दे दिया। अक्षय-वट बगल के किले के अंदर है, जो अकबर द्वारा बनवाया गया था। हमलोग पैदल ही मंदिर के पिछले दरवाजे से निकले। यद्यपि लोग टोटो या कार से भी जा रहे थे, किन्तु हम लोग समझ न पाए। तो पैदल ही किले के अंदर पहुँचे। यहाँ किसी तरह का टिकट नहीं लगता।

अक्षय वट और पातालपुरी मंदिर

प्रयागराज क़िले के अंदर पवित्र अक्षय वट


       घुसते ही बायीं तरफ अक्षय वट जाने का छायादार रास्ता दिखा और दाहिनी तरफ पातालपुरी मंदिर का गेट। हम लोग पहले बायीं तरफ ही चले। लगभग चार सौ फ़ीट चलकर अक्षय वट के पास पहुँचे जिसका दूर से ही ग्रिल घेरे के बाहर से दर्शन हो रहा था। दर्शन के बाद वहीं पर पत्नी ने दीप जलाया। अंदर एक नेपाली सुरक्षाकर्मी थे जिन्हें पत्नी ने हनुमान मंदिर का एक लड्डू प्रसाद में दिया और अंदर से दर्शन करने का पूछा। उन्होंने मना किया कि यह अनुमति नहीं है, फिर उन्होंने पूछा कि कहाँ से आए हो। जानकर बोले कि बहुत दूर से आए हो, चलो मैं अपने रिस्क पर खोलता हूँ जल्दी से अंदर दर्शन कर निकल जाना। उनकी कृपा से हम लोग अक्षय वट के पास गए, परिक्रमा की और स्पर्श भी किया। नीचे गिरे कुछ पत्ते भी मिले जो हमने रख लिया। हमारे कारण एक और परिवार ने भी अंदर आकर दर्शन किया। गार्ड जी को धन्यवाद कर हमलोग वापस किले के प्रवेश के पास पहुँचे। 

प्रयागराज क़िले में पातालपुरी मंदिर

 

      सामने में पातालपुरी मंदिर का प्रवेश द्वार था जिसके ऊपर बड़ा सा समुद्र-मंथन का चित्र बना था। हमलोग अंदर गए और मंदिर के प्रवेश के पास पुजारी द्वारा संक्षेप में कथा सुनी और कुछ दक्षिणा रख कर नीचे उतरे। बेसमेंट में कई देवताओं और ऋषि-मुनियों की प्रतिमाएं थीं। दर्शन कर वापस ऊपर आये जहाँ एक और प्राचीन वट वृक्ष था। इधर के पुजारियों का कहना था कि ये ही अक्षय-वट हैं। हमने इनकी भी परिक्रमा की। पास ही झाड़ू लगा रही एक सफाई कर्मचारी हमारी तरफ कुछ आसरा लगा कर देख रही थी। कुछ पैसे उसे दिए तो खुश हो कर बोली कि वट के पत्ते को साफ़ कर अक्षत हल्दी रख कर लाल कपडे से लपेट कर पूजा स्थान में रखना। ड्राइवर को फोन कर दिया था कि किले के पास ही गाड़ी ले आवे। वहाँ से दर्शन कर निकले और गाड़ी से अगले प्रसिद्ध मंदिर की ओर निकले। 

नाग वासुकि मंदिर 

   यह भी प्रयागराज का एक प्राचीन मंदिर है जो त्रिवेणी संगम अथवा किले से लगभग ढ़ाई किलोमीटर दूर है। गंगा जी के किनारे में यह मंदिर एक ऊँचे स्थान पर है। मंदिर से पहले गंगाजी में जो घाट है उसका भी नाम दशाश्वमेध घाट है (यह नाम बनारस के प्रसिद्ध घाट का भी है) | सूरज ऊपर आ चुका था। मंदिर के सामने ज्यादा भीड़ न थी। एक ही मालाकार की दूकान थी जिससे फूल माला ले कर सामने लगभग 60 -70 सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर मंदिर के पास पहुँचे। सीढ़ियों के किनारे कुछ साधू जीवित नाग ले कर बैठे थे जिनका भक्तों को प्रदर्शन कर रहे थे। 

प्रयागराज में नाग वासुकि मंदिर


        ऊपर मुख्य मंदिर में कई फन वाले बासुकी नाग की पत्थर की प्रतिमा है, जिसका पूजन चल रहा था। हमने अपनी फूल-माला दी जो पुजारी द्वारा मूर्ति पर चढ़ाया गया। पास में ही एक शिवजी का भी मंदिर है। प्रांगण में कई नीम के पेड़ हैं। मंदिर के चबूतरे पर कई पंडित जी जप इत्यादि करते दिखे। प्रांगण में थोड़ा घूमकर वापस गाड़ी में आए और अंतिम सोचे हुए स्थान की ओर चले। 

मनकामेश्वर महादेव मंदिर        

       यह एक प्राचीन महादेव मंदिर है जो शारदा पीठ से जुड़ा है। यहाँ एक दीवार पर दिवंगत स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती शंकराचार्य का चित्र भी अंकित है। ये भी उसी किले के अंदर है किन्तु पूर्वी छोर पर। चूँकि हमलोग किले से ढ़ाई किलोमीटर पश्चिम में नाग-वासुकि मंदिर के पास थे, अतः मनकामेश्वर मंदिर जाने के लिए लगभग 6 किलोमीटर ड्राइव कर किले के पूर्व की ओर आना पड़ा। इस प्राचीन मंदिर के सामने एक कतार में फूल-मालाओं की दूकान है। जैसे ही आप मंदिर की ओर बढ़ते हैं, ये फूलवाले पुकार-पुकार कर आपको बुलाते हैं। इनसे फूल -प्रसाद ले कर मंदिर में गए। 

प्रयागराज किले के पूर्वी भाग में 
श्री मनकामेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर


      मनकामेश्वर महादेव का छोटा सा प्राचीन मन्दिर चारों तरफ से खुला है। भक्तजन ही शिवलिंग के चारों ओर बैठकर पूजा कर रहे थे। बाकी लोग पीछे से झुककर जल-फूल अर्पित कर रहे थे। कोई पुजारी न था जिसे फूल-प्रसाद चढ़ाने को देते। हमने भी स्वयं ही पूजा कर प्रसाद चढ़ाया। परिसर में ही एक श्री ललितामनोकामेश्वरी देवी मंदिर है जिसका दरवाजे वाला ग्रिल बंद था हमने वहीं से प्रणाम किया। इसी के बगल में एक हनुमान जी का भी मंदिर है। सभी मंदिरों में प्रणाम कर हम लोग पीछे की ओर गए जहाँ से यमुना जी का बहुत ही मनोरम दृश्य नज़र आ रहा था। 

      त्रिवेणी स्नान और इन मुख्य मंदिरों में दर्शन कर हम लोग वापस होटल पहुँचे जहाँ से चेक-आउट कर अपने अगले गंतव्य लखनऊ के लिए निकले जहाँ अगले दिन हमें आमंत्रित स्थल पर उपनयन संस्कार में शामिल होना था। 

(लखनऊ यात्रा का विवरण अगले ब्लॉग में। ....... )

  


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