Wednesday, May 6, 2026

प्रयागराज, लखनऊ, नैमिषारण्य और बनारस की राउंड-ट्रिप यात्रा - भाग-1

संध्या के समय हमलोग प्रयागराज मे प्रवेश किए

  उद्देश्य

          27 अगस्त को लखनऊ में एक उपनयन संस्कार में आने का न्यौता मिला। उपनयन मेरे चाचाजी के दो पोतों का था। घर की बात थी तो जाना जरुरी था। किन्तु घर से लखनऊ की दूरी लगभग 750 किलोमीटर है। दो व्यक्तियों के लिए फ्लाइट से जाने आने में लगभग 70 हजार रूपये खर्च होते जो बहुत ज्यादा था। ट्रेन में कन्फर्म टिकट नहीं दिख रहे थे, ऊपर से ट्रेन से कानपुर जाना होता फिर वहाँ से टैक्सी। पत्नी घुटने के दर्द के कारण ट्रेन से जाने की इच्छुक नहीं थी। अंततः मैंने अपनी कार से जाने का फैसला किया। एक ड्राइवर को साथ लेना जरुरी था। एक दिन में इतनी लम्बी ड्राइव सही नहीं होती, तो हमने जाते - आते एक जगह बीच में नाईट हाल्ट का प्लान बनाया। जाते समय मैंने प्रयागराज में और वापसी में बनारस में रुकने का सोचा। प्रयाग जाना इसलिए चाह रहा था कि पिछली बार कुम्भ में जब आया तो प्रतिबंधों के कारण कार को 20 किलोमीटर दूर ही छोड़ना पड़ा था। कितनी मुश्किलों से टेंट होटल में पहुंचे थे और लौटने में तो तारे दिन में दिखने लगे थे। कुम्भ यात्रा का विवरण यहाँ पढ़ सकते हैं - महाकुम्भ यात्रा -पौष पूर्णिमा और मकर संक्रांति पर शाही स्नान। होटल से पैदल ढाई किलोमीटर चलकर अरैल संगम घाट जाना और स्नान कर आना, बस दो दिन यही किया था। और कोई स्थान देख भी नहीं पाया था। इसलिए इस बार ढंग से प्रयाग में रुकने का सोचा। इसके अतिरिक्त लखनऊ से 100 किलोमीटर दूर नैमिषारण्य जाने का लक्ष्य रखा जहाँ पहले कभी न गया था। 

यात्रा आरम्भ

      तय कार्यक्रम के अनुसार 25 अप्रैल की सुबह हमलोग अपनी कार से ड्राइवर के साथ निकले। संयोग से जी -टी रोड क्लियर मिला, कहीं जाम न मिला। शाम पाँच बजते बजते हम लोग चुंगी चौराहे के पास पहले से बुक किए होटल में पहुँचे। इस बार मुझे वहाँ संगम स्नान करने की इच्छा थी जहाँ गंगा और यमुना दोनों नदियों के किनारे मिलते थे, बिलकुल नुकीले चोंच आकार के मिलान स्थल पर। इसलिए मैंने खोजबीन कर चुंगी चौराहे के पास इस होटल को चुना था जो पास भी था और बढ़िया भी। होटल का नाम था "राधे कृष्णा रेजीडेंसी" | इस होटल की विशेषता यह थी कि इसके कमरों में नंबर नहीं थे बल्कि उनके नाम रखे गए थे। हमारे कमरे का नाम था केशवी। 

होटल के कमरों के नंबर न थे
नाम थे


       शाम को आस-पास के स्थानों को देखने के लिए गूगल मैप सर्च किया तो आधे किलोमीटर दूर ही एक शक्तिपीठ का पता चला। तो हमने वहां दर्शन करने का सोचा और वापसी में डिनर करते हुए लौटने का सोचा।      

प्रयागराज में शक्तिपीठ

       मैप देखते हुए हमलोग मंदिर पहुंचे जहाँ अभी आरती चल रही थी। यह मंदिर है "श्री माँ अलोप शंकरी देवी" का। मंदिर के अंदर वाली दूकान से नारियल,फूल माला ले कर हमलोग लाइन में लगे। आरती के कारण लाइन लम्बी थी। आधे घंटे में हमें गर्भ-गृह में प्रवेश मिल गया। फूल मालाओं से ढंके एक चबूतरे के बीच माता के दाहिने हाथ का पंजा बना है जिसके ऊपर एक छतरी लटकती रहती है।

अलोप शंकरी देवी शक्तिपीठ, प्रयागराज


    दर्शन कर मंदिर के अन्य विग्रहों के आगे भी शीश झुकाये। प्रसाद लेकर वापस निकले। चुंगी चौराहे के पास कुछ अच्छे रेस्टॉरेंट भी हैं। उन्ही में से एक में डिनर लिया और होटल में रात्रि विश्राम के लिए आ गए।    

त्रिवेणी संगम स्नान

त्रिवेणी संगम का घाट जहाँ गंगा और यमुना जी
के एक एक किनारे मिलते हैं।


      सबेरे फ्रेश होकर हमलोग कार से त्रिवेणी संगम की ओर निकले। घाट के पास पहुँचते पहुँचते कई नाववाले पूछने आये कि बीच संगम में ले जाकर स्नान करा देंगे किन्तु पहले जब भी आया था नाव से ही बीच में स्नान किया था। इस बार मन बना कर आया था उस जगह स्नान करूँगा जहाँ गंगाजी और यमुना जी का एक-एक किनारा मिलता है, जो चिड़िया के चोंच सी मैप पर दिखती है। इसलिए नाव वालों को मना कर दिया। घाट के पास गाड़ी रोककर उसमें सामान और चप्पल रखकर हम लोग स्नान वाले कपड़ों में त्रिवेणी घाट की ओर बढ़े। स्नान वाला घाट सुरक्षा के लिए फ्लोटिंग घेरे से सुरक्षित किया गया था। गर्मी के मौसम के कारण पानी की गहराई अधिकतम कमर भर ही थी। हम लोगों ने जी भर कर मनचाही जगह पर त्रिवेणी स्नान किया और गाड़ी के पास आकर कपड़े बदले।

लेटे हनुमान जी

     दूसरा लक्ष्य था लेटे हनुमान जी का दर्शन करना। कुछ दूर पर ही ये मंदिर है, तो गाड़ी से यहाँ पहुँचे और प्रसाद खरीदकर दर्शन किया। 

लेटे हनुमानजी, प्रयागराज


       मंदिर के प्रवेश के पास ही एक दीप विक्रेता दीप लेने की जिद करने लगा तो हमने कहा कि अक्षय वट का दर्शन करना है। उसने रास्ता बताया और कहा कि एक दीप ले लो और अक्षय-वट के पास जला देना। और अगर वट वृक्ष का गिरा पत्ता मिले तो रख लेना। उसने एक माचिस भी साथ में दे दिया। अक्षय-वट बगल के किले के अंदर है, जो अकबर द्वारा बनवाया गया था। हमलोग पैदल ही मंदिर के पिछले दरवाजे से निकले। यद्यपि लोग टोटो या कार से भी जा रहे थे, किन्तु हम लोग समझ न पाए। तो पैदल ही किले के अंदर पहुँचे। यहाँ किसी तरह का टिकट नहीं लगता।

अक्षय वट और पातालपुरी मंदिर

प्रयागराज क़िले के अंदर पवित्र अक्षय वट


       घुसते ही बायीं तरफ अक्षय वट जाने का छायादार रास्ता दिखा और दाहिनी तरफ पातालपुरी मंदिर का गेट। हम लोग पहले बायीं तरफ ही चले। लगभग चार सौ फ़ीट चलकर अक्षय वट के पास पहुँचे जिसका दूर से ही ग्रिल घेरे के बाहर से दर्शन हो रहा था। दर्शन के बाद वहीं पर पत्नी ने दीप जलाया। अंदर एक नेपाली सुरक्षाकर्मी थे जिन्हें पत्नी ने हनुमान मंदिर का एक लड्डू प्रसाद में दिया और अंदर से दर्शन करने का पूछा। उन्होंने मना किया कि यह अनुमति नहीं है, फिर उन्होंने पूछा कि कहाँ से आए हो। जानकर बोले कि बहुत दूर से आए हो, चलो मैं अपने रिस्क पर खोलता हूँ जल्दी से अंदर दर्शन कर निकल जाना। उनकी कृपा से हम लोग अक्षय वट के पास गए, परिक्रमा की और स्पर्श भी किया। नीचे गिरे कुछ पत्ते भी मिले जो हमने रख लिया। हमारे कारण एक और परिवार ने भी अंदर आकर दर्शन किया। गार्ड जी को धन्यवाद कर हमलोग वापस किले के प्रवेश के पास पहुँचे। 

प्रयागराज क़िले में पातालपुरी मंदिर

 

      सामने में पातालपुरी मंदिर का प्रवेश द्वार था जिसके ऊपर बड़ा सा समुद्र-मंथन का चित्र बना था। हमलोग अंदर गए और मंदिर के प्रवेश के पास पुजारी द्वारा संक्षेप में कथा सुनी और कुछ दक्षिणा रख कर नीचे उतरे। बेसमेंट में कई देवताओं और ऋषि-मुनियों की प्रतिमाएं थीं। दर्शन कर वापस ऊपर आये जहाँ एक और प्राचीन वट वृक्ष था। इधर के पुजारियों का कहना था कि ये ही अक्षय-वट हैं। हमने इनकी भी परिक्रमा की। पास ही झाड़ू लगा रही एक सफाई कर्मचारी हमारी तरफ कुछ आसरा लगा कर देख रही थी। कुछ पैसे उसे दिए तो खुश हो कर बोली कि वट के पत्ते को साफ़ कर अक्षत हल्दी रख कर लाल कपडे से लपेट कर पूजा स्थान में रखना। ड्राइवर को फोन कर दिया था कि किले के पास ही गाड़ी ले आवे। वहाँ से दर्शन कर निकले और गाड़ी से अगले प्रसिद्ध मंदिर की ओर निकले। 

नाग वासुकि मंदिर 

   यह भी प्रयागराज का एक प्राचीन मंदिर है जो त्रिवेणी संगम अथवा किले से लगभग ढ़ाई किलोमीटर दूर है। गंगा जी के किनारे में यह मंदिर एक ऊँचे स्थान पर है। मंदिर से पहले गंगाजी में जो घाट है उसका भी नाम दशाश्वमेध घाट है (यह नाम बनारस के प्रसिद्ध घाट का भी है) | सूरज ऊपर आ चुका था। मंदिर के सामने ज्यादा भीड़ न थी। एक ही मालाकार की दूकान थी जिससे फूल माला ले कर सामने लगभग 60 -70 सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर मंदिर के पास पहुँचे। सीढ़ियों के किनारे कुछ साधू जीवित नाग ले कर बैठे थे जिनका भक्तों को प्रदर्शन कर रहे थे। 

प्रयागराज में नाग वासुकि मंदिर


        ऊपर मुख्य मंदिर में कई फन वाले बासुकी नाग की पत्थर की प्रतिमा है, जिसका पूजन चल रहा था। हमने अपनी फूल-माला दी जो पुजारी द्वारा मूर्ति पर चढ़ाया गया। पास में ही एक शिवजी का भी मंदिर है। प्रांगण में कई नीम के पेड़ हैं। मंदिर के चबूतरे पर कई पंडित जी जप इत्यादि करते दिखे। प्रांगण में थोड़ा घूमकर वापस गाड़ी में आए और अंतिम सोचे हुए स्थान की ओर चले। 

मनकामेश्वर महादेव मंदिर        

       यह एक प्राचीन महादेव मंदिर है जो शारदा पीठ से जुड़ा है। यहाँ एक दीवार पर दिवंगत स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती शंकराचार्य का चित्र भी अंकित है। ये भी उसी किले के अंदर है किन्तु पूर्वी छोर पर। चूँकि हमलोग किले से ढ़ाई किलोमीटर पश्चिम में नाग-वासुकि मंदिर के पास थे, अतः मनकामेश्वर मंदिर जाने के लिए लगभग 6 किलोमीटर ड्राइव कर किले के पूर्व की ओर आना पड़ा। इस प्राचीन मंदिर के सामने एक कतार में फूल-मालाओं की दूकान है। जैसे ही आप मंदिर की ओर बढ़ते हैं, ये फूलवाले पुकार-पुकार कर आपको बुलाते हैं। इनसे फूल -प्रसाद ले कर मंदिर में गए। 

प्रयागराज किले के पूर्वी भाग में 
श्री मनकामेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर


      मनकामेश्वर महादेव का छोटा सा प्राचीन मन्दिर चारों तरफ से खुला है। भक्तजन ही शिवलिंग के चारों ओर बैठकर पूजा कर रहे थे। बाकी लोग पीछे से झुककर जल-फूल अर्पित कर रहे थे। कोई पुजारी न था जिसे फूल-प्रसाद चढ़ाने को देते। हमने भी स्वयं ही पूजा कर प्रसाद चढ़ाया। परिसर में ही एक श्री ललितामनोकामेश्वरी देवी मंदिर है जिसका दरवाजे वाला ग्रिल बंद था हमने वहीं से प्रणाम किया। इसी के बगल में एक हनुमान जी का भी मंदिर है। सभी मंदिरों में प्रणाम कर हम लोग पीछे की ओर गए जहाँ से यमुना जी का बहुत ही मनोरम दृश्य नज़र आ रहा था। 

      त्रिवेणी स्नान और इन मुख्य मंदिरों में दर्शन कर हम लोग वापस होटल पहुँचे जहाँ से चेक-आउट कर अपने अगले गंतव्य लखनऊ के लिए निकले जहाँ अगले दिन हमें आमंत्रित स्थल पर उपनयन संस्कार में शामिल होना था। 

(लखनऊ यात्रा का विवरण अगले ब्लॉग में। ....... )

  


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