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Wednesday, May 6, 2026

प्रयागराज, लखनऊ, नैमिषारण्य और बनारस की राउंड-ट्रिप यात्रा - भाग-1

संध्या के समय हमलोग प्रयागराज मे प्रवेश किए

  उद्देश्य

          27 अगस्त को लखनऊ में एक उपनयन संस्कार में आने का न्यौता मिला। उपनयन मेरे चाचाजी के दो पोतों का था। घर की बात थी तो जाना जरुरी था। किन्तु घर से लखनऊ की दूरी लगभग 750 किलोमीटर है। दो व्यक्तियों के लिए फ्लाइट से जाने आने में लगभग 70 हजार रूपये खर्च होते जो बहुत ज्यादा था। ट्रेन में कन्फर्म टिकट नहीं दिख रहे थे, ऊपर से ट्रेन से कानपुर जाना होता फिर वहाँ से टैक्सी। पत्नी घुटने के दर्द के कारण ट्रेन से जाने की इच्छुक नहीं थी। अंततः मैंने अपनी कार से जाने का फैसला किया। एक ड्राइवर को साथ लेना जरुरी था। एक दिन में इतनी लम्बी ड्राइव सही नहीं होती, तो हमने जाते - आते एक जगह बीच में नाईट हाल्ट का प्लान बनाया। जाते समय मैंने प्रयागराज में और वापसी में बनारस में रुकने का सोचा। प्रयाग जाना इसलिए चाह रहा था कि पिछली बार कुम्भ में जब आया तो प्रतिबंधों के कारण कार को 20 किलोमीटर दूर ही छोड़ना पड़ा था। कितनी मुश्किलों से टेंट होटल में पहुंचे थे और लौटने में तो तारे दिन में दिखने लगे थे। कुम्भ यात्रा का विवरण यहाँ पढ़ सकते हैं - महाकुम्भ यात्रा -पौष पूर्णिमा और मकर संक्रांति पर शाही स्नान। होटल से पैदल ढाई किलोमीटर चलकर अरैल संगम घाट जाना और स्नान कर आना, बस दो दिन यही किया था। और कोई स्थान देख भी नहीं पाया था। इसलिए इस बार ढंग से प्रयाग में रुकने का सोचा। इसके अतिरिक्त लखनऊ से 100 किलोमीटर दूर नैमिषारण्य जाने का लक्ष्य रखा जहाँ पहले कभी न गया था। 

यात्रा आरम्भ

      तय कार्यक्रम के अनुसार 25 अप्रैल की सुबह हमलोग अपनी कार से ड्राइवर के साथ निकले। संयोग से जी -टी रोड क्लियर मिला, कहीं जाम न मिला। शाम पाँच बजते बजते हम लोग चुंगी चौराहे के पास पहले से बुक किए होटल में पहुँचे। इस बार मुझे वहाँ संगम स्नान करने की इच्छा थी जहाँ गंगा और यमुना दोनों नदियों के किनारे मिलते थे, बिलकुल नुकीले चोंच आकार के मिलान स्थल पर। इसलिए मैंने खोजबीन कर चुंगी चौराहे के पास इस होटल को चुना था जो पास भी था और बढ़िया भी। होटल का नाम था "राधे कृष्णा रेजीडेंसी" | इस होटल की विशेषता यह थी कि इसके कमरों में नंबर नहीं थे बल्कि उनके नाम रखे गए थे। हमारे कमरे का नाम था केशवी। 

होटल के कमरों के नंबर न थे
नाम थे


       शाम को आस-पास के स्थानों को देखने के लिए गूगल मैप सर्च किया तो आधे किलोमीटर दूर ही एक शक्तिपीठ का पता चला। तो हमने वहां दर्शन करने का सोचा और वापसी में डिनर करते हुए लौटने का सोचा।      

प्रयागराज में शक्तिपीठ

       मैप देखते हुए हमलोग मंदिर पहुंचे जहाँ अभी आरती चल रही थी। यह मंदिर है "श्री माँ अलोप शंकरी देवी" का। मंदिर के अंदर वाली दूकान से नारियल,फूल माला ले कर हमलोग लाइन में लगे। आरती के कारण लाइन लम्बी थी। आधे घंटे में हमें गर्भ-गृह में प्रवेश मिल गया। फूल मालाओं से ढंके एक चबूतरे के बीच माता के दाहिने हाथ का पंजा बना है जिसके ऊपर एक छतरी लटकती रहती है।

अलोप शंकरी देवी शक्तिपीठ, प्रयागराज


    दर्शन कर मंदिर के अन्य विग्रहों के आगे भी शीश झुकाये। प्रसाद लेकर वापस निकले। चुंगी चौराहे के पास कुछ अच्छे रेस्टॉरेंट भी हैं। उन्ही में से एक में डिनर लिया और होटल में रात्रि विश्राम के लिए आ गए।    

त्रिवेणी संगम स्नान

त्रिवेणी संगम का घाट जहाँ गंगा और यमुना जी
के एक एक किनारे मिलते हैं।


      सबेरे फ्रेश होकर हमलोग कार से त्रिवेणी संगम की ओर निकले। घाट के पास पहुँचते पहुँचते कई नाववाले पूछने आये कि बीच संगम में ले जाकर स्नान करा देंगे किन्तु पहले जब भी आया था नाव से ही बीच में स्नान किया था। इस बार मन बना कर आया था उस जगह स्नान करूँगा जहाँ गंगाजी और यमुना जी का एक-एक किनारा मिलता है, जो चिड़िया के चोंच सी मैप पर दिखती है। इसलिए नाव वालों को मना कर दिया। घाट के पास गाड़ी रोककर उसमें सामान और चप्पल रखकर हम लोग स्नान वाले कपड़ों में त्रिवेणी घाट की ओर बढ़े। स्नान वाला घाट सुरक्षा के लिए फ्लोटिंग घेरे से सुरक्षित किया गया था। गर्मी के मौसम के कारण पानी की गहराई अधिकतम कमर भर ही थी। हम लोगों ने जी भर कर मनचाही जगह पर त्रिवेणी स्नान किया और गाड़ी के पास आकर कपड़े बदले।

लेटे हनुमान जी

     दूसरा लक्ष्य था लेटे हनुमान जी का दर्शन करना। कुछ दूर पर ही ये मंदिर है, तो गाड़ी से यहाँ पहुँचे और प्रसाद खरीदकर दर्शन किया। 

लेटे हनुमानजी, प्रयागराज


       मंदिर के प्रवेश के पास ही एक दीप विक्रेता दीप लेने की जिद करने लगा तो हमने कहा कि अक्षय वट का दर्शन करना है। उसने रास्ता बताया और कहा कि एक दीप ले लो और अक्षय-वट के पास जला देना। और अगर वट वृक्ष का गिरा पत्ता मिले तो रख लेना। उसने एक माचिस भी साथ में दे दिया। अक्षय-वट बगल के किले के अंदर है, जो अकबर द्वारा बनवाया गया था। हमलोग पैदल ही मंदिर के पिछले दरवाजे से निकले। यद्यपि लोग टोटो या कार से भी जा रहे थे, किन्तु हम लोग समझ न पाए। तो पैदल ही किले के अंदर पहुँचे। यहाँ किसी तरह का टिकट नहीं लगता।

अक्षय वट और पातालपुरी मंदिर

प्रयागराज क़िले के अंदर पवित्र अक्षय वट


       घुसते ही बायीं तरफ अक्षय वट जाने का छायादार रास्ता दिखा और दाहिनी तरफ पातालपुरी मंदिर का गेट। हम लोग पहले बायीं तरफ ही चले। लगभग चार सौ फ़ीट चलकर अक्षय वट के पास पहुँचे जिसका दूर से ही ग्रिल घेरे के बाहर से दर्शन हो रहा था। दर्शन के बाद वहीं पर पत्नी ने दीप जलाया। अंदर एक नेपाली सुरक्षाकर्मी थे जिन्हें पत्नी ने हनुमान मंदिर का एक लड्डू प्रसाद में दिया और अंदर से दर्शन करने का पूछा। उन्होंने मना किया कि यह अनुमति नहीं है, फिर उन्होंने पूछा कि कहाँ से आए हो। जानकर बोले कि बहुत दूर से आए हो, चलो मैं अपने रिस्क पर खोलता हूँ जल्दी से अंदर दर्शन कर निकल जाना। उनकी कृपा से हम लोग अक्षय वट के पास गए, परिक्रमा की और स्पर्श भी किया। नीचे गिरे कुछ पत्ते भी मिले जो हमने रख लिया। हमारे कारण एक और परिवार ने भी अंदर आकर दर्शन किया। गार्ड जी को धन्यवाद कर हमलोग वापस किले के प्रवेश के पास पहुँचे। 

प्रयागराज क़िले में पातालपुरी मंदिर

 

      सामने में पातालपुरी मंदिर का प्रवेश द्वार था जिसके ऊपर बड़ा सा समुद्र-मंथन का चित्र बना था। हमलोग अंदर गए और मंदिर के प्रवेश के पास पुजारी द्वारा संक्षेप में कथा सुनी और कुछ दक्षिणा रख कर नीचे उतरे। बेसमेंट में कई देवताओं और ऋषि-मुनियों की प्रतिमाएं थीं। दर्शन कर वापस ऊपर आये जहाँ एक और प्राचीन वट वृक्ष था। इधर के पुजारियों का कहना था कि ये ही अक्षय-वट हैं। हमने इनकी भी परिक्रमा की। पास ही झाड़ू लगा रही एक सफाई कर्मचारी हमारी तरफ कुछ आसरा लगा कर देख रही थी। कुछ पैसे उसे दिए तो खुश हो कर बोली कि वट के पत्ते को साफ़ कर अक्षत हल्दी रख कर लाल कपडे से लपेट कर पूजा स्थान में रखना। ड्राइवर को फोन कर दिया था कि किले के पास ही गाड़ी ले आवे। वहाँ से दर्शन कर निकले और गाड़ी से अगले प्रसिद्ध मंदिर की ओर निकले। 

नाग वासुकि मंदिर 

   यह भी प्रयागराज का एक प्राचीन मंदिर है जो त्रिवेणी संगम अथवा किले से लगभग ढ़ाई किलोमीटर दूर है। गंगा जी के किनारे में यह मंदिर एक ऊँचे स्थान पर है। मंदिर से पहले गंगाजी में जो घाट है उसका भी नाम दशाश्वमेध घाट है (यह नाम बनारस के प्रसिद्ध घाट का भी है) | सूरज ऊपर आ चुका था। मंदिर के सामने ज्यादा भीड़ न थी। एक ही मालाकार की दूकान थी जिससे फूल माला ले कर सामने लगभग 60 -70 सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर मंदिर के पास पहुँचे। सीढ़ियों के किनारे कुछ साधू जीवित नाग ले कर बैठे थे जिनका भक्तों को प्रदर्शन कर रहे थे। 

प्रयागराज में नाग वासुकि मंदिर


        ऊपर मुख्य मंदिर में कई फन वाले बासुकी नाग की पत्थर की प्रतिमा है, जिसका पूजन चल रहा था। हमने अपनी फूल-माला दी जो पुजारी द्वारा मूर्ति पर चढ़ाया गया। पास में ही एक शिवजी का भी मंदिर है। प्रांगण में कई नीम के पेड़ हैं। मंदिर के चबूतरे पर कई पंडित जी जप इत्यादि करते दिखे। प्रांगण में थोड़ा घूमकर वापस गाड़ी में आए और अंतिम सोचे हुए स्थान की ओर चले। 

मनकामेश्वर महादेव मंदिर        

       यह एक प्राचीन महादेव मंदिर है जो शारदा पीठ से जुड़ा है। यहाँ एक दीवार पर दिवंगत स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती शंकराचार्य का चित्र भी अंकित है। ये भी उसी किले के अंदर है किन्तु पूर्वी छोर पर। चूँकि हमलोग किले से ढ़ाई किलोमीटर पश्चिम में नाग-वासुकि मंदिर के पास थे, अतः मनकामेश्वर मंदिर जाने के लिए लगभग 6 किलोमीटर ड्राइव कर किले के पूर्व की ओर आना पड़ा। इस प्राचीन मंदिर के सामने एक कतार में फूल-मालाओं की दूकान है। जैसे ही आप मंदिर की ओर बढ़ते हैं, ये फूलवाले पुकार-पुकार कर आपको बुलाते हैं। इनसे फूल -प्रसाद ले कर मंदिर में गए। 

प्रयागराज किले के पूर्वी भाग में 
श्री मनकामेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर


      मनकामेश्वर महादेव का छोटा सा प्राचीन मन्दिर चारों तरफ से खुला है। भक्तजन ही शिवलिंग के चारों ओर बैठकर पूजा कर रहे थे। बाकी लोग पीछे से झुककर जल-फूल अर्पित कर रहे थे। कोई पुजारी न था जिसे फूल-प्रसाद चढ़ाने को देते। हमने भी स्वयं ही पूजा कर प्रसाद चढ़ाया। परिसर में ही एक श्री ललितामनोकामेश्वरी देवी मंदिर है जिसका दरवाजे वाला ग्रिल बंद था हमने वहीं से प्रणाम किया। इसी के बगल में एक हनुमान जी का भी मंदिर है। सभी मंदिरों में प्रणाम कर हम लोग पीछे की ओर गए जहाँ से यमुना जी का बहुत ही मनोरम दृश्य नज़र आ रहा था। 

      त्रिवेणी स्नान और इन मुख्य मंदिरों में दर्शन कर हम लोग वापस होटल पहुँचे जहाँ से चेक-आउट कर अपने अगले गंतव्य लखनऊ के लिए निकले जहाँ अगले दिन हमें आमंत्रित स्थल पर उपनयन संस्कार में शामिल होना था। 

(लखनऊ यात्रा का विवरण अगले ब्लॉग में। ....... )

  


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Tuesday, January 28, 2025

महाकुम्भ यात्रा -पौष पूर्णिमा और मकर संक्रांति पर शाही स्नान

महाकुंभ में मकर संक्रांति पर त्रिवेणी संगम स्नान
 

             जैसा कि आप सभी जानते हैं कि इस वर्ष 2025 का प्रयाग में लगने वाला कुम्भ, महाकुम्भ है जो 144 वर्षों के पश्चात आता है। प्रयागराज में जब पिछला कुम्भ लगा था तब भी जाने की इच्छा थी पर परिस्थिवश न जा पाया था। अतः इस बार कुम्भ में जाने की इच्छा प्रबल थी। दिसम्बर 2024 में इसकी प्लानिंग शुरू की और सबसे पहले होटल की ऑनलाइन खोज शुरू की। महाकुम्भ 13 जनवरी 2025 से शुरू होने वाला था और शुरू के दो लगातार दिन ही शाही स्नान का दिन था। 13 जनवरी पौष पूर्णिमा और 14 जनवरी मकर संक्रांति के कारण शाही अथवा अमृत स्नान का दिन तय था। दो लगातार अमृत स्नान का दिन होने के कारण मैंने निर्णय किया कि 12 जनवरी को होटल में चेक इन करूँगा और 13 तथा 14 जनवरी दोनों शुभ दिनों को शाही स्नान करूँगा फिर 14 जनवरी को चेक आउट कर वापसी यात्रा करूँगा। 

{इस ब्लॉग पोस्ट को नीचे के यूट्यूब एम्बेडेड लिंक में सुन सकते हैं}

 ऑनलाइन होटल काफी महँगे थे। मुझे दो रात के लिए तीन लोगों के लिए एक रूम चाहिए था जो त्रिवेणी संगम के पास भी हो जिससे हमें घाट तक ज्यादा पैदल न चलना पड़े। मैं पत्नी और बेटी के साथ जाने वाला था। अंततः मैंने अरैल की तरफ जो कि यमुना जी की ओर है कुम्भ कैंप में रूम बुक किया जो प्रति दिन लगभग 18000 रूपये की दर से थे। यह नॉन रिफंडेबल था। लोकेशन DPS तिराहा के पास था। 

             जगह मिल जाने पर अब जाने आने का ट्रेन टिकट चाहिए था पर यह मुश्किल साबित हुआ। दोनों ही तरफ का वेटिंग टिकट लेना पड़ा वह भी अपने लोकेशन से करीब 50 - 60 किलोमीटर दूर के स्टेशन से बोर्डिंग का। 9 जनवरी आते आते लगा टिकट कन्फर्म न हो पायेगा। अतः कैंसिल करा दिया। फिर अपने गाड़ी से ही जाने का निर्णय किया यह सोच कर कि ड्राइवर ले लेंगे जिससे सामान के साथ ट्रैन पर चढ़ने उतरने का झंझट न रहेगा। सीधे होटल और वहीँ से वापस। इससे हमलोग 12 जनवरी की सुबह ही चल कर प्रयाग पहुँच सकते थे। जबकि ट्रेन से टिकट 11 जनवरी का था। 

         परन्तु सब कुछ सोचा हुआ तो नहीं होता। हमलोग शाम साढ़े छः बजे जब प्रयाग से लगभग 22 किलोमीटर दूर थे तो प्रयाग में जाने के सरे रास्ते बंद कर दिए गए। स्थानीय लोगों  पूछा तो दो किलोमीटर आगे से एक रास्ता बताया गया। गूगल मैप से जाने का प्रयास किया तो आधे घंटे घुमा कर वापस उसी जगह आ गए। उस जगह कुछ ऑटो वाले थे। पहला ही ऑटोवाला बोला कि अरैल बहुत दूर है। कोशिश करूँगा पहुँचाने की पर जहाँ तक पुलिस वाले जाने देंगे वहाँ तक जाऊँगा। 700 में भाड़ा तय हुआ। हमने सारा सामन ऑटो में लादा और ड्राइवर को गाडी के साथ दो दिन वहीं आस-पास रहने का निर्देश दे कर खाने का पैसा दिया और चल पड़े ऑटो से। ऑटो वाला भी उसी रास्ते से गया जिससे अभी हमलोग घूम कर लौटे थे पर स्थानीय होने के कारण उसे रास्ते की जानकारी थी। करीब चार किलोमीटर चलने पर फिर एक चौराहे पर बैरिकेडिंग थी और घुसने नहीं दे रहे थे। ऑटो वाले ने रॉंग साइड के सर्विस लेन से एंट्री मारी और घुस गया। उसकी चिंता पुल पर घुसने की थी जो सीधे अरैल घाट जाती थी। संयोग से किसी ने उसे पुल पर जाने से न रोका। 

        पुल से उतर कर अरैल घाट तिराहे पर फिर पुलिस वालों ने आगे जाने से रोक दिया। अभी भी तीन किलोमीटर दूर थे कुम्भ कैंप से। अंततः एक पुलिस वाले जो ओहदे में कुछ ऊपर थे उनसे रिक्वेस्ट किया कि कुम्भ कैंप में हमारा रूम बुक है, साथ में महिलायें हैं कृपया जाने दें। उसने कागज़ माँगे। जब हमने दिखाया तो उसे दया आयी और हमें बढ़ने दिया। जब गूगल मैप देखते हुए हमलोग कुम्भ कैंप पहुंचे तो वहां कियारा रेस्टॉरेंट लिखा देखा। अंदर रेसप्शन पर बताया गया कि हमारे लिस्ट में आपका नाम नहीं है। हमने होटल के नंबर पर फोन किया तो एक व्यक्ति आया और कुछ देर आपस में माथापच्ची करते हुए बगल के एक परिसर में में ले गए जहाँ अस्थायी कमरे बनाये गए थे। हमें एक कमरे में घुसाया गया जहाँ चार बेड और चार कम्बल रखे थे। किन्तु देख कर यह स्पष्ट हो रहा था कि कमरे पूरी तरह तैयार नहीं थे। इस कमरे में सब कुछ तो ठीक था पर बाथरूम में शटर नहीं लगा था। यद्यपि कमोड, गीजर और पानी वगैरह था पर शटर लगाने का प्रयास किया जा रहा था। मैनेजर ने कहा कि आपलोग रात का खाना खा सकते हैं कूपन वहीं मिलेगा जहाँ पहले हमलोग पहुंचे थे। पर रास्ते में दिन को हमारा भोजन भारी था तो रात में नहीं खाया। सामने में शटर भी लगवाया। 

कुंभ कैम्प के अस्थायी कमरे, DPS तिराहा के पास, अरैल ।
   

                  अस्थायी कमरे एक लाइन से बनाये गए थे। कमरे की कतारों के बीच में गलियारा था। कमरे की एकमात्र खिड़की गलियारे में ही खुलती थी जिसमें शीशे का स्लाइडिंग शटर था। इससे गलियारे से रूम दिखाई पड़ता था। तो हमने एक कम्बल से खिड़की को अंदर से ढँक दिया और सोने गए। सबेरे तैयार हो कर स्नान पश्चात पहनने के कपडे ले कर होटल से निकले। छः बजने वाले थे। सबसे पहले हमने पास के एक दूकान से चाय पी और पक्की सड़क से नदी किनारे वाले रास्ते पर उतरे। साफ़ सुथरे और लोहे की मोटी चादरों से ढँके रास्ते थे जिस पर यात्री अरैल घाट की ओर जा रहे थे। रास्ते में एक सिद्धेश्वर घाट भी मिला। यहाँ संगम स्नान करते हैं भक्त जन। किन्तु हमलोग आगे अरैल घाट की ओर बढे जो संगम से ज्यादा नजदीक है। करीब तीन किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। यहाँ आकर देखा कि कुछ आगे नाव वाले भी हैं जो बीच संगम में ले जा रहे हैं। हमने पहले तो घाट पर स्नान का सोचा था पर नाव सेवा देखा तो यह बेहतर लगा। 

पौष पूर्णिमा १३ जनवरी को सुबह
अरेल घाट जाने का रास्ता ।
 

        पत्नी और बेटी को एक जगह बैठा कर नाव भाड़े पर लिया और फिर उन्हें बुला कर संगम की ओर चले। ये नाव वाले पहले आपको एक ऐसी नाव पर ले जायेंगे जहाँ एक पंडित बैठे मिलेंगे। एक थाली में तीन नारियल रख कर संकल्प कराएँगे जिसमें दान के रूप में ब्राह्मण भोजन की राशि शामिल होगी। आपसे 1, 3, 5 या 11 ब्राह्मण भोजन का संकल्प कराया जायेगा और प्रत्येक ब्राह्मण भोजन की राशि 501 रूपये होगी। नारियल थाली के 100 रूपये लिए जायेंगे। फिर त्रिवेणी में दूध डालने के नाम पर एक छोटे ग्लास दूध का 100 रुपया भी लिया जा सकता है। अब त्रिवेणी में उतर कर स्नान करें जिसमें पानी  गहराई कमर से भी कम है। स्नान के बाद उसी नाव से वापस लौटते हैं। जब हमलोग लौटे तो भीड़ बढ़ चुकी थी और हमारी नाव को उस जगह आने नहीं दिया गया जहाँ से हम चढ़े थे बल्कि और दूर में उतरना पड़ा। 

13 जनवरी 2025 को त्रिवेणी संगम पर नावों की भीड़
 

            हमलोग पार्किंग के खाली जगह में बैठे और घर से लाया हुआ सूखा नाश्ता किया। वापस पैदल बढ़े। एक जगह फिर चाय पी। दो किलोमीटर पैदल वापस आते हुए पत्नी बेहाल हो गयी। एक इ-रिक्शा जाता हुआ दिखा, पत्नी ने जाने का पूछा तो बचे एक किलोमीटर के लिए उसने प्रति व्यक्ति 100 रूपये माँगा। पत्नी की हालत देख कर मैं राज़ी हो गया क्योंकि उन्हें घुटने की कुछ समस्या थी। जहाँ उसने उतारा वहाँ से 100 मीटर चल कर रूम पर हमलोग आ गए। होटल मैनेजर वहीं था। स्वयं उसने याद दिलाया कि खाने का कूपन हमलोग उस वाले कैंप से ले कर खा लें। पता कर हमने कूपन लिया और खाने वाली जगह पर गए जो एक खुले आँगन में बुफे सिस्टम से था। बढ़िया शाकाहारी भोजन था। उसी कैंप में ठहरे एक दंपत्ति से बातचीत में पता चला की वे लोग तीनों टाइम यहाँ भोजन कर रहे थे। हमलोग तो उस समय खाने के बाद रात में न खा पाए क्योंकि रूम पर आ कर थके हुए सो गए। शाम को सिर्फ चाय पीने निकले और फिर आ कर सो गए।        

14 जनवरी 2025, मकर संक्रांति की सुबह अरेल घाट का रास्ता
  

                सुबह उठ कर फ्रेश हुए और फिर निकल पड़े मकर संक्रांति के शाही स्नान पर। आज 14 जनवरी के कारण पिछले दिन से ज्यादा भीड़ थी। सबेरे हमलोग फ्रेश थे तो अरैल घाट तक 3 किलोमीटर चल लिए परन्तु नाव की खोज में और एक किलोमीटर ज्यादा VIP घाट तक जाना पड़ा। ज्यादा भीड़ के कारण नावों का घाट ज्यादा दूर कर दिया गया था। नाव वालों को भी संगम तक जाने में दूरी बढ़ गयी। यमुना में अभी आधी दूर ही गए थे कि पुलिस वालों ने संगम की तरफ जाने वाली नावों को रोक दिया। संगम पर नावों की भीड़ बढ़ गयी थी इसलिए वहाँ भीड़ कम होने पर ही हमें आगे जाने की अनुमति मिलती। करीब 20 मिनट तक हमलोग बीच यमुना में नाव में बैठे रहे। जब अनुमति मिली तो आगे बढ़े। इस बार उसने हमें सरकार द्वारा संगम पर बनाये गए फ्लोटिंग प्लेटफार्म के पास लाया। फिर वही क्रम चला। प्लेटफार्म पर जाने से पहले पंडितजी द्वारा तीन नारियल के साथ संकल्प, दक्षिणा, आदि तब प्लेटफार्म के दूसरी तरफ उतर कर स्नान किया। फिर वापसी में उसी जगह नाव वाले ने उतारा। जब हमलोग उतरे तो पता चला कि प्रशासन द्वारा अभी नाव सेवा बंद कर दी गयी थी। 

त्रिवेणी संगम पर स्नान के लिए बनाया गया तैरता प्लेटफार्म
और वस्त्र बदलने का रूम ।
 

           हमारी इच्छा अक्षय वट और हनुमान जी के दर्शन की भी थी परन्तु उसके लिए हमें पीपा पुल से उस पार जाना और आना पड़ता जो बहुत दुष्कर लग रहा था। ऊपर से यह भी पता चला कि भीड़ बढ़ने के कारण दर्शन रोक दिया गया है। 

महाकुंभ में मकर संक्रांति पर तैरते प्लेटफार्म से उतर कर
त्रिवेणी संगम में स्नान करते श्रद्धालु ।
 

         कुछ दूर वापसी कर एक खुले पार्किंग में हमलोग बैठे और कुछ साथ में लाये बिस्कुट और सूखा नाश्ता ले कर पानी पिया। वापसी में पुनः अरैल घाट आते आते पत्नी को चलना दूभर हो गया। नदी किनारे के अस्थायी रोड पर इक्का दुक्का चलने वाले इ-रिक्शा से पूछ रही थी। एक रिक्शा पर एक माँ -बेटा रिज़र्व में स्नान से लौट रहे थे, उन्हें दया आ गयी तो हम तीनों को बिठा लिया। भाड़ा रिक्शा वाले ने वही 100 रूपये प्रति व्यक्ति लिया पर आज लगभग इसमें 3 किलोमीटर चले। उतरकर रिक्शा वाले को भाड़ा दिया और उन माँ बेटे को धन्यवाद। रूम पर आये। पत्नी अभी कुछ आराम करना चाह  रही थी पर मुझे लौटने की चिंता हो रही थी। प्रशासन ने सारा रोड बंद कर रखा था। एक पुलिस वाले ने बताया था कि 100 मीटर अंदर मोहल्ले के मोड़ पर ऑटो मिलेगा। होटल छोड़ने से पहले मैं निश्चित कर लेना चाहता था कि मोड़ पर ऑटो है या नहीं ।अतः पहले अकेले ही गया । एक ऑटो देखा, उससे बात की। उसने कहा कि सहसों नहीं जाऊँगा, बस स्टैंड तक चलूँगा । समान और परिवार को लाने में आधा घंटा लगता तो वाह चला गया । चूँकि और एक ऑटो लगा था तो मैंने होटल छोड़ कर छोटी छोटी दूरी की ही सही, ऑटो से जाने का निश्चय किया । होटल छोड़ते समय मैनेजर को फ़ोन किया तो वह बोला आप कमरा खुला छोड़ कर ही चेक आउट कर जायें । किंतु बाहर निकलते ही उससे भेंट हो गई । उसने कहा कि यदि पहले बोलते तो कुछ इंतजाम करता गाड़ी का, फिर एक लड़के को साथ लगाया जो समान को ढोने में हेल्प करता और ऑटो तक पहुँचाता । जब वहाँ पहुँचा तो एक कार के साथ कुछ लड़के खड़े थे जो प्रति व्यक्ति 100 रुपये ले कर बस तक छोड़ने की बात कर रहे थे । उन्ही के साथ चला । रास्ते में उसने बताया कि समान के साथ बस में दिक्कत होगी आगे जा कर ऑटो तक छोड़ देता हूँ जो यमुना पुल तक छोड़ देगा । अतिरिक्त पैसे ले कर उसने ऑटो तक छोड़ा और ऑटो वाले ने पुल तक । अब पुल पर कोई सवारी प्रशासन चलने नहीं दे रहा था ।हमें कम से कम झूसी पहुंचना था जहाँ से सहसों तक जा सकते थे ।पुल पर कुछ मोटर साइकिल वाले थे जो एक एक आदमी को सामान के साथ उस पर पहुँचा रहे थे ।सौ - सौ रुपये ले कर। पर सामान के साथ पत्नी और बेटी को मोटर साइकिल पर बैठाना सही नहीं लगा क्योंकि तीन बक्से और दो बैग थे , गिरने का डर लग रहा था। तो मज़बूरी में पैदल ही चलने का फैसला किया। बक्से में व्हील लगे थे तो उन्हें खींच कर और ठेल कर चले। यात्रा का यही चरण सबसे कठिन था। लगभग दो किलोमीटर चले होंगे हमलोग पुल को पार करने में। उस पार जाकर संयोग से ऑटो मिला जिसने झूसी पहुँचाया फिर झूसी से सहसों दूसरा ऑटो। तो इस तरह हमलोग अपने कार तक आये जिसमें सिर्फ ऑटो मिल जाने पर ही हमलोग खुद को भाग्यशाली समझते थे, पैसे का तो सोचना ही नहीं था। जो भाड़ा माँगा, देना पड़ा। 

                      फोन कर ड्राइवर को गाडी वहीं लाने बोला जहाँ हमें उसने उतारा था। लगभग पाँच बज रहे थे। दिन भर की थकावट थी और चिंता से अब मुक्त हुए तो सबको चाय पीने की बहुत तलब हुयी। आगे जा कर एक ढाबा में चाय पिया फिर सीधे झारखण्ड के लिए निकल लिए। बस एक बार आठ बजे जी टी रोड के एक ढाबा में खाने रुके। आने में कोई परेशानी न हुयी। इस प्रकार हमारी महाकुम्भ की यात्रा पूरी हुई जिसमें हमने पौष पूर्णिमा और मकर संक्रांति के दो पावन दिनों में त्रिवेणी संगम में स्नान किया। कुम्भ जैसे अवसर पर इतना चलना तो पड़ता ही है। 

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