Saturday, April 7, 2035

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Thursday, May 28, 2026

प्रयागराज, लखनऊ, नैमिषारण्य और बनारस की राउंड-ट्रिप यात्रा - भाग-4

 पिछले ब्लॉग - प्रयागराज, लखनऊ, नैमिषारण्य और बनारस की राउंड-ट्रिप यात्रा - भाग-3 - से आगे  ........ 

सारनाथ मंदिर में भगवान बुद्ध की गोल्डन प्रतिमा


बनारस में होटल

    नैमिषारण्य से लखनऊ को बाईपास करते हुए छः-साढ़े छः बजे तक हम लोग बनारस में प्रवेश कर गए। यहाँ देखा की जगह जगह पर प्रधानमंत्री मोदी की उस शाम बनारस यात्रा के पोस्टर लगे थे और स्वागत में टोलियाँ भी थीं। पुलिस वाले हर चौराहे पर मुस्तैद थे और उनकी गश्त भी हो रही थी। मन में शंका हुई, पता नहीं किस चौक पर गाड़ी रुकवा दी जाए। किन्तु ऐसा कुछ भी न हुआ। हम लोग होटल पहुंचे, जिसका नाम था "होटल बुद्धा", और यह रामकटोरा में स्थित था। यह लहुराबीर चौक से पास ही था। ऑनलाइन थोड़ा रिसर्च कर मैंने ये होटल चुना था जिसमें साफ-सफाई के साथ साथ गाड़ी पार्किंग की जगह और लिफ्ट हो। अपनी कार से जाने के कारण पार्किंग बहुत जरुरी था क्योंकि बाबा विश्वनाथ मंदिर के आसपास की सड़कों में चारपहिया वाहनों पर काफी पाबंदियां होती हैं। कई बार लोग मंदिर के पास होटल बुक तो कर लेते हैं पर सवारी होटल तक नहीं जा पाती। मान लें आप ट्रेन या बस से ही आए हों और भाड़े की टैक्सी या ऑटो में सामान रख होटल चले। पास पहुँचने पर पता चला कि आगे अब सिर्फ टोटो या रिक्सा ही जा सकता है। कुछ और आगे बढ़े तो पता चलेगा कि आगे सिर्फ पैदल ही जा सकते हैं। ऐसे में आप होटल वाले को फोन करते हैं। वो भी आपको एक नियत जगह से ही सामान लाने में मदद करेंगे। यानि आप अपने सामान के साथ पैदल होटल तक चलेंगे, शायद आधा किमी तक। इस दृष्टिकोण से यह होटल ठीक था। 

 

वाराणसी के होटल बुद्धा का कमरा 

        सारा कुछ ठीक ही था पर कमरे आशा के अनुरूप न थे। दीवारों पर कई जगह धब्बे थे। टॉयलेट छोटा था और इसमें लकड़ी के रैक ख़राब हो रहे थे। टॉयलेट का फ्लोर भी एक स्टेप ऊँचा था। हमने दो रात्रि का होटल बुक किया था तो अगले दिन कमरा चेंज करा लिया यद्यपि यह भी बहुत अच्छा न था। 


बनारस का चाट

बनारस का काशी चाट भण्डार


      आज गंगा आरती देखने का समय निकल चुका था, अतः इसे हमने कल शाम के लिए रखा। फिर भी अभी शाम का समय था घूमने के लिए, तो लहुराबीर चौक से गोदौलिया की तरफ पैदल ही निकले। रास्ते में एक जगह बढ़िया लस्सी पी। अब पैदल चला नहीं जा रहा था, तो एक रिक्शा लिया और गिरिजाघर चौक पर उसने हमें उतार दिया। कुछ कंस्ट्रक्शन का काम सड़क पर हो रहा था, तो पैदल ही गोदौलिया चौक तक गए। यहाँ एक दुकान के पास बहुत भीड़ थी। यह था काशी चाट भंडार। हमने टमाटर चाट का नाम सुना था, तो हम लोग भी दुकान में घुसे और टमाटर चाट खाया। फिर दही भल्ले भी खाया। तीन आइटम खाकर पेट फुल हो चुका था। शाम को बाबा मंदिर जाने का मन था, पर अब थकावट लग रही थी, तो हम लोग रिक्शा लेकर होटल लौटे और आराम किया। 


बनारस में गंगा स्नान

 

बनारस में गंगा आरती के लिए भक्तों की भीड़

         सबेरे उठकर हम लोग गंगा स्नान के लिए दशाश्वमेध घाट पहुंचे। कुछ महीने पहले मेरा एक फोन झपट लिया गया था, इस लिए हमने सारे मोबाइल होटल में ही छोड़े, और स्नान के बाद पहनने का कपड़ा ले कर ही गए। घाट पर एक पंडित जी की चौकी पर कपड़े रखे और एक-एक कर स्नान किया। स्नान के बाद घाट के दुकानदारों से पता चला कि अभी प्रधान मंत्री मंदिर में पूजा करेंगे, दो घंटे मंदिर में आम जनों का प्रवेश बंद रहेगा। उन लोगों ने घाट पर ही शीतला माता मंदिर में पूजा करने की सलाह दी। हमने भी सोचा, पता नहीं वहां पूजा कर पाएँ या न कर पाएँ, तो इसी मंदिर में पूजा कर निकले। 


बाबा विश्वनाथ दर्शन

काशी विश्वनाथ मंदिर (फोटो-गूगल से साभार)


        फिर सोचा कि सुनी सुनाई बात है एक बार हम लोग मंदिर जा कर देख लेते हैं। चार नंबर गेट वाली गली से निकले तो एक फूल वाले ने बोला, दर्शन हो रहा है, अभी नहीं आए हैं पी एम, जल्दी जाइये। गीले कपड़ों का झोला उसी की दुकान में रखा और उससे फूल लेकर हम लोग लाइन में लगे। लाइन थोड़ी बढ़ा ही था कि रोक दिया गया। एक पुलिस वाले ने कहा कि धूप बहुत है, आपलोग सामने अन्नपूर्णा मंदिर में बैठें। दर्शन चालू होने पर लाइन में आ जाना। हमें भी ये सही लगा, तो अन्नपूर्णा माता के ही दर्शन कर वहीं एक जगह बैठे। तभी मुझे जोरों की प्यास लगी। पत्नी को वहीं बैठाकर मैं मंदिर के बाहर निकला, देखा कि लाइन चलना शुरू हुआ है। दौड़कर पत्नी को बुलाया और लाइन में लगे। वहीं पर पीने के ठंडे पानी का नल लगा था।  जल्दी से वहीं तीन-चार चुल्लू पानी पी और लाइन लगा। लगा कि पंद्रह मिनट में दर्शन हो जायेंगे। परिसर के अंदर सिक्योरिटी चेक करा कर कुछ आगे बढे ही होंगे कि फिर लाइन रोक दिया गया। फिर आधा घंटा लाइन में खड़े रहे। खड़े रहने में बंदरों का आतंक झेलना पड़ता है। गर्मी में कभी वे किसी का जल लेकर पी जा रहे थे तो किसी का प्रसाद छीन ले रहे थे। हमारा जल तो कागज़ के गिलास में था। जिन्होंने मेटल के लोटे में जल लाए थे, उन्हें पुलिस वाले अंदर नहीं ले जाने दे रहे थे। आधे घंटे के बाद थोड़ी लाइन बढ़ी पर जब हमलोग वहाँ पहुँचे जहाँ से अंदर का परिसर नजर आता है तब फिर लाइन रोक दी गयी। पता चला कि पीएम आ गए हैं। परिसर में कई पंडित एक लाइन से खड़े हो कर मत्रोच्चार कर रहे थे। सिर्फ जरूरी लोग और सुरक्षाकर्मी ही परिसर में थे। आधे घंटे बाद पीएम पूजा कर निकले और त्रिशूल-डमरू लेकर फोटो खिंचवाए। हमलोग बस देखते रहे।  उनके निकलने के दस मिनट बाद दर्शन शुरू हुआ। पंद्रह मिनट में दर्शन हो गया और सुरक्षाकर्मियों ने हमें वापस परिसर से बाहर निकाल दिया। साधारण दिनों में हमलोग परिसर के अन्य मंदिरों, नंदी बाबा और पवित्र कूप का दर्शन करते हैं जो इस बार न हो सका। बाहर फूल वाले की दुकान खोजने में थोड़ा भटकना पड़ा। उसने अपना कार्ड दिया था, जिसे दिखाकर सही जगह पर पहुंचे। अब उसकी दुकान बंद मिली। बगल के दुकानदार से फोन कराकर बुलवाया। अपना झोला, चप्पल लेकर गली से बाहर निकले। भूख लगी, बाहर ही नाश्ते की दुकान थी, वहीं पूड़ी सब्ज़ी खाया और निकले। थक गए थे हम लोग। होटल आ कर थोड़ी देर सोये। 


काल भैरव मंदिर 

बाबा काल भैरव, वाराणसी


       एक घंटा आराम कर हम लोग टोटो से काल भैरव मंदिर के लिए निकले। टोटो वाले ने हमें थाने वाले चौक पर ही उतार दिया, बोला कि आगे जाने की अनुमति नहीं है। मंदिर थोड़ी ही दूर पर है पीछे वाली गली से निकल जाओ। हम लोग उसी गली से निकले। थोड़ी दूर पर फूल वाला एक लड़का फूल देने लगा। उसी ने कहा चलिए मंदिर का रास्ता दिखा देता हूँ दर्शन हो जायेगा। उसके पीछे चले। मंदिर में अभी ज्यादा भीड़ न थी। अच्छे से ही दर्शन हो गया। दर्शन के बाद उन्हीं गलियों से खोजते हुए फूल वाले लड़के के पास गए। उसे पैसे देकर निकले।


बिंदु माधव मंदिर 

बिंदु माधव मंदिर, बनारस में शिवलिंगों से भरा कक्ष


      कथा वाचक राजन जी ने कभी कथा में कहा था कि काशी जाते हैं तो एक बार बिंदु माधव मंदिर जरूर जाएँ। पत्नी के मन में था कि इस बार जाएँ। मैप में तो करीब एक किमी के अंदर यह मंदिर दिखा रहा था पर पैदल उन भूल भुलैया सी पतली गलियों में जाना आसान न था। पूछते बढ़ रहे थे कि एक बाइक वाले ने पूछा कहाँ जाना है। हमने बताया। उसने बाइक से पहुँचाने की बात कही, पर हमने कहा कि दो आदमी हैं, ट्रिपल राइडिंग में दिक्कत होगी। तभी एक और बाइक वाला आया जो ज्यादा होशियार था। उसे इस मंदिर और रास्ते का पता था। वह आगे-आगे चला और पीछे से पहला बाइक वाला। थोड़ी देर में हमलोग बिंदु माधव मंदिर के सामने पहुँचे। बाइक वाले को हमने रुकने बोला क्योंकि हमें फिर वापस जाना था पर जब तक हम लोग मंदिर से वापस आते उनलोगों ने एक सवारी का ट्रिप ले कर फिर मंदिर के पास आ गए। पिछले साल कुम्भ मेले में जब से प्राइवेट बाइक वालों ने सवारी उठाने की शुरुआत की थी यह हर ऐसी कठिन जगहों पर शुरू हो गयी है। एक तरह से ठीक ही है, सवारी को भी आसानी होती है और बेरोजगार युवाओं को कमाई भी हो जाती है। 

बिन्दु माधव मंदिर के अंदर का दृश्य 
(फ़ोटो-गूगल)


      बिंदु माधव मंदिर प्रथम ताल पर है। नीचे सीढ़ियों के पास एक लड़का सखुआ के दोने में प्रसाद के लिए मक्खन बेच रहा था, पचास रूपये प्रति के दर से। देखने से ऐसा लगता था जैसे मक्खन शंकु के आकार में रखा हो और ज्यादा प्रतीत होता था, किन्तु जब मंदिर से प्रसाद चढ़ा कर वापस आए और मक्खन निकलना शुरू किया तो पता चला पत्ते का दोने का जो तल था वही शंकु आकार में उठा था और उस पर मक्खन का लेप था जो ज्यादा मात्रा का भ्रम देता था। सीढ़ी से ऊपर गए, एक हॉल जैसा था जिसके पार में गर्भ गृह में बिंदु माधव की प्रतिमा थी। दर्शन और प्रसाद पाकर मंदिर के अन्य कमरों में गए, जिनमें से एक में अनेक शिवलिंग थे। यह मंदिर ऋषि अग्निबिन्दु को विष्णु के वरदान से स्थापित है। ऋषि यहीं पंचगंगा घाट के पास रहते थे और जल की कुछ बूंदों पर ही जीवित थे। उनकी तपस्या से विष्णु प्रसन्न हुए और सदा यहाँ रहने का वचन दिया। ऐतिहासिक लेखन से पता चलता है कि कभी यहाँ एक भव्य मंदिर था और माधव की रत्नों से सुज्जित 6 फुट की एक प्रतिमा थी किन्तु 1669 में आतताइयों द्वारा मंदिर तोड़ा गया, भक्तों ने प्रतिमा को कहीं छिपा दिया गया और बाद में यहाँ मराठा राजा भावन राव द्वारा स्थापित किया गया। ये पंचमाधव में से एक हैं जिनकी भक्ति से कार्मिक पाप नष्ट होते हैं। 


बी.एच.यू. मंदिर और संकटमोचन मंदिर  

BHU के विश्वनाथ मंदिर में पंचमुख महादेव


     बिंदु माधव मंदिर से निकल उन्हीं बाइक से वापस काल भैरव वाले उसी पुलिस चौंकी के पास आये जहाँ टोटो वाले ने शुरू में उतरा था। वहाँ से पैदल चलकर एक दही लस्सी की दुकान में आए और लस्सी पीया। धूप बहुत ज्यादा थी, एक ऑटो वाले से बी.एच.यू. और संकटमोचन मंदिर जाने का तय किया। यद्यपि भाड़ा ज्यादा लगा फिर भी धूप के हिसाब से चलना उचित लगा। वहाँ से बी.एच.यू. जाने में अच्छा खासा समय लगा। ऑटो वाला एक जगह खड़ी कर, वहीं आने बोला। मंदिर जाने से पहले एक दुकान की कतार थी जिसमें खाने और अन्य सामान की बिक्री का प्रयोजन था। 

BHU में विश्वनाथ मंदिर के सामने
पं. मदन मोहन मालवीय जी की प्रतिमा


     अंदर पंडित मदन मोहन मालवीय जी की प्रतिमा थी। गेट पर जूते रखने का स्टाल था। जूते रखकर हम लोग मंदिर तक दौड़े क्योंकि धूप से पत्थर का फर्श तप रहा था। मुख्य विश्वनाथ शिवलिंग बड़ा सा था जहाँ एक पंडित जी बैठे थे। ज्यादा भीड़ न थी आधे तो छात्र ही लग रहे थे। बड़ा सा मंदिर, फैला-फला से गलियारे अच्छे लग रहे थे और शांतिप्रद थे। कई और भी प्रतिमाएँ थीं जिनमें पंचमुखी बड़ा शिवलिंग आकर्षित करता है। अंदर कुछ देर बैठ कर हमलोग बहार दूकानों के पास आए और एक खाने की दूकान में इडली, डोसा, कोल्ड कॉफी इत्यादि लिए। रेट्स काफी कम थे। वहां से ऑटो वाला हमें संकट मोचन मंदिर ले गया। बुधवार था इस लिए ज्यादा भीड़ न थी। मुझे लगा था कि मानस मंदिर यहीं पर होगा, पर पता चला कि वो थोड़ी दूर पर है। ऑटो वाले से तो उसका तय नहीं किया था, तो अगली बार के लिए छोड़ दिया। हमने ऑटो वाले को गोदौलिया चौक के पास छोड़ने बोला था, पर उसने हमें पहले ही एक तिराहे पर उतार दिया। वहां से गोदौलिया के लिए रिक्शा लेकर बढ़े ही थे कि मौसम काफी ख़राब हो गया। जोरों की आँधी बारिश शुरू हो गयी। संयोग से हम लोग एक आरा मिल के खुले गेट के पास थे। जल्दी से उतरकर बारिश से भीगने से बचने के लिए उसमें घुसे। लगभग बीस मिनट रुके रहें। छोटे साइज के ओले भी गिर रहे थे। जब पानी रुका तो मौसम ठंडा और ढँका सा हो गया। किन्तु हवा तेज थी। 


गंगा आरती

मोटरबोट से गंगा आरती के बाद
गंगा घाटों के दर्शन के लिए रवाना


    गिरिजाघर चौक के पास रिक्शे से उतर कर हमलोग दशाश्वमेध घाट की तरफ चले। अभी गंगा आरती की कोई हलचल नहीं थी। किनारे से चलते हुए हम लोग बगल वाले घाट की ओर चले। वहाँ भी गंगा आरती होती है। किनारे पर कई नावें और मोटरबोट लगे थे। एक मोटरबोट पर आरती देखने के लिए हरे रंग की कुर्सियां लगाई गई थीं। मैं उनके पास गया भी किन्तु अभी वे ग्राहकों में कोई रूचि नहीं ले रहे थे। मज़बूरी में समय काटने के लिए वहीं खड़े इधर-उधर देख रहे थे। कई स्त्री-पुरुष इस घाट पर अभी भी स्नान कर रहे थे, लेकिन स्नान के लिए मुझे यह घाट उचित नहीं लगा। कारण यह है कि बगल में ही एक बड़े गंदे नाले का पानी नदी में मिल रहा था। बारिश के कारण गंदे पानी का प्रवाह भी ज्यादा था। निचली सीढ़ियों पर जाने से दुर्गन्ध भी आ रही थी।छः बजे के आसपास आरती की तैयारियों की शुरुआत हुई। आरती वाली जगह के पीछे कुर्सियाँ लगायी जाने लगीं जिनपर बैठने के लिया लोग पहले से आ कर प्रतीक्षा करते हैं, किन्तु हमें तो नाव से आरती देखनी थी।

        साढ़े छः बजे तक आरती वाले पंडितगण पहुँचे किन्तु हवा अभी भी इतनी तेज थी कि रह-रह कर उनके आसन इत्यादि उड़ जा रहे थे। खैर लगा कि आज आरती तो होगी। अब मोटरबोट वाले ने भी बुलाना शुरू किया। प्रत्येक कुर्सी का 300 रूपये लिए जा रहे थे। हम लोग सबसे आगे की कुर्सी पर बैठ गए। धीरे धीरे साडी कुर्सियां भर गयीं। बीच में एक बार फुहार तेज हो गयी तो उनलोगों ले तिरपाल लगाया, पर हवा की तेजी से लगता था कि तिरपाल फैट जायेगा। जब फुहार कम हुई तो इसे हटाया गया। यह आरती देखने में भी बाधक थी। बोट वाले ने कहा कि हवा कम होने के बाद आरती पश्चात् प्रशासन की अनुमति से गंगा घाटों को भी दिखाया जायेगा, अगर अनुमति न मिली तो सबको एक-एक सौ रूपये लौटा दिए जायेंगे। दोनों घाटों पर आरती प्रारम्भ हुई। खचाखच भीड़ थी। मौसम भी अच्छा और ठंडा था। भक्तिपूर्ण माहौल में गंगा आरती देखना जीवन का एक अनोखा और अविस्मरणीय अनुभव था। आरती की समाप्ति पर मोटरबोट वाले ने हमें गंगा घाटों के दर्शन कराए।       


कुबेर पान भंडार

कुबेर पान भंडार, गोदौलिया चौक, वाराणसी


        बोट से हमें निकलते साढ़े आठ बज चुके थे। भूख भी लगी थी। सड़क पर एते ही एक दो खाने की दुकान नजर आई, वहीं हमने रोटी सब्जी खाई और रिक्शा के लिए गिरजाघर चौक की तरफ बढ़े। थोड़ा आगे आने पर गोदौलिया चौक के पास "कुबेर पान भंडार" दिखाई दिया। हमने खाने की सोची। दो परातों में अलग-अलग तरह के पान थे। एक 60 रूपये पीस दूसरा 250 रूपये पीस। हमने 60 वाली दो पीस लिए किन्तु उन्होंने 100 रूपये ही मांगे। बढ़िया बनारसी पैन था। होटल आ कर फ्रेश हुए। काफी थक गए थे दिनभर की यात्रा से। सबेरे हमें होटल छोड़ कर घर के लिए निकलना था। मैंने मैप पर सारनाथ खोजा तो देखा कि हमारे वापसी रूट से वहाँ जाना आसान था और होटल से मात्र 14 किमी था। तो निश्चय किया कि कल सारनाथ भी देखते चलेंगे। 


सारनाथ

सारनाथ में बुद्ध मंदिर


       सबेरे तैयार होकर बुद्धा होटल से चेक आउट किया और अपनी गाड़ी से निकल पड़े। मैप देखकर हम लोग सारनाथ में मंदिर के बाहर पहुंचे जहाँ से आगे गाड़ी जाने की अनुमति नहीं थी। यह एक खुली जगह थी जहाँ बीच में एक बड़ा पेड़ था। रुकते ही कई लोग पास आये। उनमें से एक ने कहा कि गाड़ी यहीं साइड में लगा दें और एक गाइड ले लें जिसे मात्र 100 रुपये देने हैं। पहली बार आए थे तो एक गाइड लेना ठीक लगा। गाइड हमें मंदिर परिसर में ले गया। मंदिर परिसर के ठीक दूसरी तरफ एक बड़ा और पुराना स्तूप दिखाया गया। धूप अत्यधिक थी, अतः ज्यादा पास नहीं गए दूर से ही देखा। उसने बताया कि स्तूप उसी स्थान पर है जहाँ पर बुद्ध ने सबसे पहले पांच शिष्यों को ज्ञान और दीक्षा दी थी। किन्तु अभी वह दूसरे परिसर में है जहाँ जाने के लिए घूमकर जाना होता है। हमने यहीं से देखा। मुख्य मंदिर को पीछे से घूम  कर गाइड ने दिखाया। मंदिर में जो मूर्ति है वह गोल्डन है किन्तु उसमें सोना नहीं है। पत्थर का ही है, किन्तु विशेष पॉलिश है। उसने बताया कि मंदिर की पीछे जो गांव है उसमें मंदिर ट्रस्ट द्वारा बुनकरी की ट्रेनिंग दी गयी है। वे लोग बनारसी साड़ियाँ बनाते हैं और बाहर पार्किंग के पास सहयोग समिति के आउटलेट से इन्हें बेचा जाता है। गांव वालों को रोजगार मिलता है। मुख्य मंदिर में प्रवेश से पहले गाइड हमें बगल के छोटे परिसर में ले गया।  यहाँ एक तरफ एक बड़ा घंटा लटका था जो विशेष अवसर बजाया जाता है वहीं दूसरी तरफ एक पीपल का पेड़ है जो श्रीलंका से उस पेड़ की डाली लाकर लगाया गया है जो सम्राट अशोक के पुत्र महेंद्र ने बोधगया के बोधिवृक्ष से ले जा कर लगाया था। जो बौद्ध अनुयायी आए थे वे इस पवित्र वृक्ष के गिरे पत्ते या फल उठा कर रख रहे थे। किनारे में घुमाये जाने वाले अनेक धर्म चक्र लगे थे। हमने भी धर्मचक्र घूमते हुए परिक्रमा की। वृक्ष के नीचे एक छोटा सा मंदिर है जिसके बाहर एक बौद्ध संत कई भक्तों को प्रवचन दे रहे थे। वहां से निकल कर मुख्य मंदिर के सामने आए जहाँ गाइड ने एक बड़े से फ्लेक्स बैनर को दिखाया जिसमें बैसाख पूर्णिमा के दिन बुद्ध के एक शारीरिक अवशेष (अस्थि) को प्रदर्शन के लिए रखे जाने का जिक्र था। प्रत्येक बैशाख पूर्णिमा को इसका प्रदर्शन किया जाता है; इस बार यह अगले ही दिन था। अब हम लोग मंदिर के अंदर गए, सुन्दर सुनहरे बुद्ध प्रतिमा के दर्शन किए। मंदिर के दीवारों पर प्रासंगिक सुन्दर भित्ति चित्र भी बने हैं। 

बनारसी साड़ियाँ

       मंदिर से निकल कर बाहर पार्किंग के पास आये। गाइड ने बुनकर समिति के आउटलेट में साड़ियाँ देखने की शिफारिश की। महिलाओं को तो देखने की इच्छा होती ही है, सो अंदर गए। संभवतः हमलोग पहले ही ग्राहक थे। देखने का सिलसिला चला तो पत्नी ने कई साड़ियाँ ले लीं। मुझे भी यहाँ का रेट सही लगा। यहाँ से निबटकर हम लोग घर के लिए गाड़ी से निकले। जीटी रोड पर आते लगभग साढ़े ग्यारह हुआ था। एक बढ़िया होटल देखकर घुसे, पर अभी यह खुला ही था और किचन को शुरू होने में ही आधे घंटे की देरी थी। तो बगल की चाय दुकान में बढ़िया चाय पी। आगे एक ढाबे में नाश्ता किया और शाम होते-होते घर पहुंचे। 

       इस प्रकार अनेक शहरों, मंदिरों और दर्शनीय स्थलों को देखते हुए यह राउंड ट्रिप आशानुरूप पूर्ण हुआ।   

 

  


इस ब्लॉग के पोस्टों की सूची































































Monday, May 18, 2026

प्रयागराज, लखनऊ, नैमिषारण्य और बनारस की राउंड-ट्रिप यात्रा - भाग-3

प्रयागराज, लखनऊ, नैमिषारण्य और बनारस की राउंड-ट्रिप यात्रा - भाग-2 से आगे  ...... 


नैमिषारण्य में होटल

     नैमिषारण्य का मुख्य तीर्थ स्थल है चक्रतीर्थ। मैंने जो होटल बुक किया था, वो यहाँ से एक किलोमीटर के अंदर था। होटल का नाम "जे पी इंटरनेशनल होटल नैमिषारण्य" था। लखनऊ में हमारे स्थान से होटल की दूरी लगभग 100 किमी मैप में दिख रही थी। दो घंटे में हम लोग होटल पहुँच गए। सामने की बिल्डिंग में रिसेप्शन और रेस्टॉरेंट था जबकि पीछे एक भवन, जिसका डिज़ाइन किसी स्कूल की तरह था, में कमरे थे। एक लंबा बरामदा और कक्षा की तरह कमरे। हमें भूतल और प्रथम तल पर कमरे दिखाए गए। हमने प्रथम तल को चुना क्योंकि वहां से सामने खुला स्पेस और गार्डन नज़र आता था। कमरा भी साफ-सुथरा और वाशरूम भी सही थे। पहले हमने चाय मंगाई,फिर कमरे में ही रात का खाना मँगा कर सो गए। 

चक्रतीर्थ 

      यहाँ ड्राइवर के लिए सोने की जगह थी। सबेरे उसे कॉल कर तैयार होने बोला, फिर हमलोग भी तैयार हो कर नीचे आए। देखा कि पार्किंग की जगह दो तीन ऑटो वाले जमा थे। हमें देखकर सभी तीर्थ दिखाने की बात करने लगे। हमने कहा कि अपनी गाड़ी से जायेंगे, उन्होंने कहा कि आपको सब जगह नहीं मालूम होगी, ऊपर से पार्किंग का झंझट होगा। हम उनकी बातों में नहीं आए और अपनी गाड़ी से ही निकले। पहला पड़ाव था चक्रतीर्थ जहाँ मैप देखते हुए पहुंचे। 

नैमिषारण्य में चक्रतीर्थ स्नान


      चक्रतीर्थ का पौराणिक महत्व यह है कि ऋषियों की प्रार्थना पर भगवान् ब्रह्मा ने अपना मनोमाया चक्र धरती पर छोड़ा। जहाँ पर यह रुका वहाँ पर जल का एक कुंड बना। यह कुण्ड कलियुग के प्रभाव से अछूता होता है। ऋषियों ने अपनी साधना के लिए इस स्थान को चुना। 88000 ऋषियों ने यहाँ ध्यान और तप किया तथा पुराणों की रचना की। चक्र की तरह गोल इस कुंड में भक्तजन स्नान करते हुए परिक्रमा करते हैं। इससे नवग्रह की पीड़ा दूर होती है। एक अन्य कथा के अनुसार जब वृत्रासुर के वध के लिए ऋषि दधीचि की हड्डियों से वज्र बनाना आवश्यक हो गया तो उनकी खोज के लिए इन्द्रादि देवता विष्णु से मदद मांगने पहुंचे। विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र पृथ्वी पर भेजा और कहा जहाँ पर यह चक्र रुकेगा, वहीं ऋषि दधीचि मिलेंगे। सुदर्शन चक्र यहीं पर रुका, और दधीचि ऋषि भी पास ही मिले। 

     जब हम लोग यहाँ पहुंचे, तो एक व्यक्ति ने बताया, 'आगे गाड़ी पार्क कर दो और अंदर जाओ। हम लोग एक झोले में पहनने का कपड़ा ले कर चक्र तीर्थ कुंड के पास पहुंचे। वहाँ चौकियों पर कई पंडित जी बैठे थे। उन्हीं में से एक के पास गए। उन्होंने संक्षेप में कथा सुनाई, संकल्प करवाया और चक्रतीर्थ में एक या दो बार स्नान करते हुए परिक्रमा करने बोला। हम लोग स्नान के लिए उतरे। कुंड के चारों ओर घेरा बना हुआ है। इस घेरे में चक्र के आकार के अनेक सीमेंट वाले ग्रिल लगे हैं। घेरे के बाहर ही स्नान करते हुए परिक्रमा की जाती है। पानी लगभग छाती तक रहता है। पानी के अंदर परिक्रमा पथ और इसमें उतरने के लिए सीढ़ी सब पक्के हैं। किन्तु फिसलन बहुत थी। सावधानी पूर्वक रेलिंग पकड़ कर स्नान के लिए उतरे। पानी मेरे छाती तक था तो स्नान करते हुए मैं चल सकता था किन्तु कद थोड़ा काम होने के कारण पत्नी को पानी का स्तर लगभग गले तक आ रहा था। इसके कारण उनका पांव फर्श पर टिक नहीं पा रहा था। मैंने उन्हें खींच कर कुंड के रेलिंग में लगे सीमेंट वाले ग्रिल को पकड़वाया, तब जा कर वे रेलिंग पकड़ते हुए परिक्रमा कर पायीं। 

     परिक्रमा पूरी कर हम लोग ऊपर आए, कपड़े बदले और पंडित जी की दक्षिणा इत्यादि दी। गीले कपड़े झोले में कर उन्हीं की चौकी पर छोड़े और कुंड के चारों तरफ बने मंदिरों में दर्शन किए। यहाँ हर जगह मंदिरों में आपसे दान की आशा की जाती है। यहाँ से दर्शन -पूजन पूरा कर पंडित जी से विदा ले हम लोग आगे व्यास गद्दी की तरफ चले जो यहाँ से एक किमी दूर होगा। 

व्यास गद्दी

    व्यास गद्दी जब पहुंचे तो भक्त जन अभी आने शुरू नहीं हुए थे। सभी मंदिर खाली ही थे। यहाँ यू पी टूरिज्म द्वारा एक बोर्ड पर इस तरह लिखा हुआ है :-

मनु शतरूपा ब्रह्मा

स्वयम्भुव मनु अरु शतरूपा।

जिनते भई नर सृष्टि अनूपा।|

मान्यता है कि नैमिष की पावन धरा पर सृष्टि का सृजन हुआ। पृथ्वी के आधार (धुरी) नैमिष में प्रथम स्त्री-पुरुष से मनुष्य सृष्टि की उत्पत्ति हुई। इस पावन स्थली में मनु-शतरूपा ने तपस्या करके जीवन का आरम्भ ही नहीं किया, वरन निराकार ब्रह्म को साकार करके मानव जाति के लिए सुलभ करते हुए सर्वश्रेष्ठ मनुष्य जीवन जीने के लिए बाध्य कर दिया।    

नैमिषारण्य में व्यास गद्दी प्रवेश द्वार


       यहाँ कई मंदिर हैं जिनमें व्यास गद्दी प्रमुख हैं जहाँ वेद-व्यास ने कई पुराणों की रचना की। इनमें श्रीमद्भागवत महापुराण और सत्यनारायण व्रत कथा प्रमुख हैं। एक बड़ा सा बरगद का वृक्ष है जो अति पुरातन एवं पवित्र मन जाता है। एक यज्ञ शाला, भगवत कथा हॉल, सत्यनाराण मंदिर, मनु-शतरूपा मंदिर, गोवर्धन मंदिर एवं माता कनक सुंदरी मंदिर है। हर स्थान पर दर्शन कर हम लोग आगे गोमती के राजघाट पर गए। 


राजघाट, गोमती नदी

नैमिषारण्य में गोमती राजघाट


      कई लोग यहाँ भी स्नान कर रहे थे। मैंने यहाँ भी कई डुबकियाँ लगाकर स्नान किया और कुछ समय इस शांतिमय वातावरण में बिताया। अगला पड़ाव था हनुमान गढ़ी। 


हनुमानगढ़ी

नैमिषारण्य के हनुमानगढ़ी का प्रवेश द्वार


      यहाँ गाड़ी खड़ी कर हमलोग हनुमान गढ़ी की तरफ प्रवेश ही करते कि यहाँ बना एक "श्रीकृष्ण, पांच पांडव और द्रौपदी" के मंदिर के पुजारियों ने कहा पहले यहाँ दर्शन होगा। वहां से दान-दर्शन के बाद हम लोग हनुमानगढ़ी मंदिर में गए। यह एक प्राचीन मंदिर है जो हनुमानजी की पाताल यात्रा से सम्बंधित है। जब अहिरावण ने राम-लक्ष्मण को पाताललोक में बंदी बना लिया था तब हनुमानजी ने अपने बल-बुद्धि से अहिरावण को मारकर, राम-लक्ष्मण को ले कर वापस आये थे। पंडित जी ने बताया कि यह मूर्ति स्वयं प्रकट हुई है। दर्शन पूजन के बाद पंडित जी की अनुमति से एक फोटो लिया। मंदिर से निकलते कुछ और जगह भी देव मूर्तियां हैं जहाँ से दर्शन कर मंदिर से नीचे उतरे। सीढ़ियों के पास एक हवन कुंड बना है जहाँ पुजारी पांच बार हवन में आहुति डालने कहते हैं। जब पार्किंग के पास आए तो एक सुन्दर तालाब के बीच में शिव-परिवार की मूर्ति देखी जहाँ शिव-जटा से पानी का फव्वारा निकल रहा था। पास ही एक खाटू श्याम मंदिर का मंदिर था जहाँ हमने अंदर जा कर दर्शन किये। 


माँ श्री ललिता देवी शक्ति पीठ

नैमिषारण्य में माँ श्री ललिता देवी शक्तिपीठ


       वहाँ से निकलकर अब हम लोग यहाँ के एक प्रमुख मंदिर गए, जो कि एक शक्तिपीठ है। यहाँ है माँ श्री ललिता देवी शक्तिपीठ मंदिर। मान्यता है कि यहाँ पर सती माता का हृदय गिरा था। मंदिर के बाहर सड़क पर गाड़ी खड़ी कर आगे बढ़े। पूजा और प्रसाद वाली दुकानों की कतारें थीं। कुछ फूल-प्रसाद लेकर हम लोग भी अंदर गए और दर्शन पूजन कर निकले। मंदिरों में पूजा करने के कारण अब तक हमने कुछ खाया नहीं था। बहार सड़क पर ड्राइवर एक दुकान में चाय पी रहा था तो हमने भी चाय पी, पर अच्छा न था। अब हमने भोजन ही करने का सोचा।


रुद्रावर्त

रुद्रावर्त कुंड,नैमिषारण्य


      हमारा होटल यहाँ से पास ही था और उसका रेस्टॉरेंट 'मद्रास कैफे' बढ़िया था। तो हम लोगों ने वहीं जाकर भोजन किया। मुख्य-मुख्य मंदिर हमलोग जा चुके थे। एक अन्य दर्शनीय स्थान था रुद्रावर्त जो यहाँ से दस किमी दूर था। वहीं के लिए निकले। कुछ दूर तो अच्छी पक्की सड़क थी पर आगे ग्रामीण सड़क एक गांव और आगे खेतों से हो कर जाती थी। अंततः हम लोग रुद्रावर्त पहुँचे जो गोमती के ही किनारे है। यहाँ की विशेषता एक कुंड है जो गोमती नदी के किनारे ही बना है। इसके नीचे पानी में शिवलिंग है और मान्यता है कि कुंड में उन्हें यदि पांच फल समर्पित किया जाये तो कुछ फल स्वीकार कर महादेव बाकी फल प्रसाद के रूप में पानी के ऊपर भेज देते हैं। पास में कई दुकानदार पाँच फलों के पैकेट बेच रहे थे। हमने भी एक पैकेट लेकर कुंड में समर्पित किये जिनमें कुछ ऊपर आए, दो फल किसी तरह ले सके, एक धार में बह गया। कुंड के ऊपर एक नंदी प्रतिमा को प्रणाम कर हम लोग होटल लौटे।   

      साढ़े ग्यारह बजने वाले थे। चेक आउट कर हम लोग गाड़ी से बनारस के लिए निकले।

(बनारस यात्रा का विवरण पढ़ें अगले ब्लॉग - "प्रयागराज, लखनऊ, नैमिषारण्य और बनारस की राउंड-ट्रिप यात्रा - भाग-4 में" )

  


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